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Rigveda Mandal 1 / Sukta 120 / Mantra 2

191 Sukta
12 Mantra
1/120/2
Devata- अश्विनौ Rishi- उशिक्पुत्रः कक्षीवान् Chhanda- भुरिग्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वि॒द्वांसा॒विद्दुर॑: पृच्छे॒दवि॑द्वानि॒त्थाप॑रो अचे॒ताः। नू चि॒न्नु मर्ते॒ अक्रौ॑ ॥

वि॒द्वांसौ॑ । इत् । दुरः॑ । पृ॒च्छे॒त् । अवि॑द्वान् । इ॒त्था । अप॑रः । अ॒चे॒ताः । नु । चि॒त् । नु । मर्ते॑ । अक्रौ॑ ॥

Mantra without Swara
विद्वांसाविद्दुर: पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेताः। नू चिन्नु मर्ते अक्रौ ॥

विद्वांसौ। इत्। दुरः। पृच्छेत्। अविद्वान्। इत्था। अपरः। अचेताः। नु। चित्। नु। मर्ते। अक्रौ ॥ १.१२०.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 22 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
जैसे (अचेताः) अज्ञान (अविद्वान्) मूर्ख (विद्वांसौ) दो विद्यावान् पण्डितजनों को (दुरः) शत्रुओं के मारने वा मन को अत्यन्त क्लेश देनेहारी बातों को (पृच्छेत्) पूछे (इत्था) ऐसे (अपरः) और विद्वान् महात्मा अपने ढङ्ग से (इत्) ही (नु) शीघ्र पूछे (अक्रौ) नहीं करनेवाले (मर्त्ते) मनुष्य के निमित्त (चित्) भी (नु) शीघ्र पूछे जिससे यह आलस्य को छोड़ के पुरुषार्थ में प्रवृत्त हो ॥ २ ॥
Essence
जैसे विद्वान् विद्वानों की सम्मति से वर्त्ताव वर्त्ते वैसे और भी वर्त्तें। सदैव विद्वानों को पूछकर सत्य और असत्य का निर्णय कर आचरण करें और झूठ को त्याग करें। इस बात में किसी को कभी आलस्य न करना चाहिये क्योंकि विना पूछे कोई नहीं जानता है, इससे किसी को मूर्खों के उपदेश पर विश्वास न लाना चाहिये ॥ २ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।