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Rigveda Mandal 1 / Sukta 12 / Mantra 6

191 Sukta
12 Mantra
1/12/6
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ॒ग्निना॒ग्निः समि॑ध्यते क॒विर्गृ॒हप॑ति॒र्युवा॑। ह॒व्य॒वाड् जु॒ह्वा॑स्यः॥

अ॒ग्निना॑ । अ॒ग्निः । सम् । इ॒ध्य॒ते॒ । क॒विः । गृ॒हऽप॑तिः । युवा॑ । ह॒व्य॒ऽवाट् । जु॒हुऽआ॑स्यः ॥

Mantra without Swara
अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा। हव्यवाड् जुह्वास्यः॥

अग्निना। अग्निः। सम्। इध्यते। कविः। गृहऽपतिः। युवा। हव्यऽवाट्। जुहुऽआस्यः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
मनुष्यों को उचित है कि जो (जुह्वास्यः) जिसका मुख तेज ज्वाला और (कविः) क्रान्तदर्शन अर्थात् जिसमें स्थिरता के साथ दृष्टि नहीं पड़ती, तथा जो (युवा) पदार्थों के साथ मिलने और उनको पृथक्-पृथक् करने (हव्यवाट्) होम किये हुए पदार्थों को देशान्तरों में पहुँचाने और (गृहपतिः) स्थान तथा उनमें रहनेवालों का पालन करनेवाला है, उस से (अग्निः) यह प्रत्यक्ष रूपवान् पदार्थों को जलाने, पृथिवी और सूर्य्यलोक में ठहरनेवाला अग्नि (अग्निना) बिजुली से (समिध्यते) अच्छी प्रकार प्रकाशित होता है, वह बहुत कामों को सिद्ध करने के लिये प्रयुक्त करना चाहिये॥६॥
Essence
जो यह सब पदार्थों में मिला हुआ विद्युद्रूप अग्नि कहाता है, उसी में प्रत्यक्ष यह सूर्य्यलोक और भौतिक अग्नि प्रकाशित होते हैं, और फिर जिसमें छिपे हुए विद्युद्रूप हो के रहते हैं, जो इन के गुण और विद्या को ग्रहण करके मनुष्य लोग उपकार करें, तो उन से अनेक व्यवहार सिद्ध होकर उनको अत्यन्त आनन्द की प्राप्ति होती है, यह जगदीश्वर का वचन है॥६॥
Subject
वह अग्नि कैसे प्रकाशित होता और किस प्रकार का है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है-