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Rigveda Mandal 1 / Sukta 12 / Mantra 4

191 Sukta
12 Mantra
1/12/4
Devata- अग्निः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhanda- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ताँ उ॑श॒तो वि बो॑धय॒ यद॑ग्ने॒ यासि॑ दू॒त्य॑म्। दे॒वैरास॑त्सि ब॒र्हिषि॑॥

तान् । उ॒श॒तः । वि । बो॒ध॒य॒ । यत् । अ॒ग्ने॒ । यासि॑ । दू॒त्य॑म् । दे॒वैः । आ । स॒त्सि॒ । ब॒र्हिषि॑ ॥

Mantra without Swara
ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम्। देवैरासत्सि बर्हिषि॥

तान्। उशतः। वि। बोधय। यत्। अग्ने। यासि। दूत्यम्। देवैः। आ। सत्सि। बर्हिषि॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
यह (अग्ने) अग्नि (यत्) जिस कारण (बर्हिषि) अन्तरिक्ष में (देवैः) दिव्य पदार्थों के संयोग से (दूत्यम्) दूत भाव को (आयासि) सब प्रकार से प्राप्त होता है, (तान्) उन दिव्य गुणों को (विबोधय) विदित करानेवाला होता और उन पदार्थों के (सत्सि) दोषों का विनाश करता है, इससे सब मनुष्यों को विद्यासिद्धि के लिये इस अग्नि की ठीक-ठीक परीक्षा करके प्रयोग करना चाहिये॥४॥
Essence
परमेश्वर आज्ञा देता है कि-हे मनुष्यो ! यह अग्नि तुम्हारा दूत है, क्योंकि हवन किये हुए परमाणुरूप पदार्थों को अन्तरिक्ष में पहुँचाता और उत्तम-उत्तम भोगों की प्राप्ति का हेतु है। इससे सब मनुष्यों को अग्नि के जो प्रसिद्ध गुण हैं, उनको संसार में अपने कार्य्यों की सिद्धि के किये अवश्य प्रकाशित करना चाहिये॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-