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Rigveda Mandal 1 / Sukta 119 / Mantra 9

191 Sukta
10 Mantra
1/119/9
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त स्या वां॒ मधु॑म॒न्मक्षि॑कारप॒न्मदे॒ सोम॑स्यौशि॒जो हु॑वन्यति। यु॒वं द॑धी॒चो मन॒ आ वि॑वास॒थोऽथा॒ शिर॒: प्रति॑ वा॒मश्व्यं॑ वदत् ॥

उ॒त । स्या । वा॒म् । मधु॑ऽमत् । मक्षि॑का । अ॒र॒प॒त् । मदे॑ । सोम॑स्य । औ॒शि॒जः । हु॒व॒न्य॒ति॒ । यु॒वम् । द॒धी॒चः । मनः॑ । आ । वि॒वा॒स॒थः॒ । अथ॑ । शिरः॑ । प्रति॑ । वा॒म् । अश्व्य॑म् । व॒द॒त् ॥

Mantra without Swara
उत स्या वां मधुमन्मक्षिकारपन्मदे सोमस्यौशिजो हुवन्यति। युवं दधीचो मन आ विवासथोऽथा शिर: प्रति वामश्व्यं वदत् ॥

उत। स्या। वाम्। मधुऽमत्। मक्षिका। अरपत्। मदे। सोमस्य। औशिजः। हुवन्यति। युवम्। दधीचः। मनः। आ। विवासथः। अथ। शिरः। प्रति। वाम्। अश्व्यम्। वदत् ॥ १.११९.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
हे मङ्गलयुक्त राजा और प्रजाजनो ! (युवम्) तुम दोनों जो (औशिजः) मनोहर उत्तम पुरुष का पुत्र संन्यासी (मदे) मद के निमित्त प्रवर्त्तमान (स्या) वह (मक्षिका) शब्द करनेवाली माखी जैसे (अरपत्) गूँजती है वैसे (वाम्) तुम दोनों को (मधुमत्) मधुमत् अर्थात् जिसमें प्रशंसित गुण है, उस व्यवहार के तुल्य (हुवन्यति) अपने को देते-लेते चाहता है उस (सोमस्य) धर्म्म की प्रेरणा करने और (दधीचः) विद्या धर्म की धारणा करनेहारे के तीर से (मनः) विज्ञान को (आ, विवासथः) अच्छे प्रकार सेवो (अथ) इसके अनन्तर (उत) तर्कवितर्क से वह (वाम्) तुम दोनों के प्रति प्रीति से इस ज्ञान को और (अश्व्यम्) विद्या में व्याप्त हुए विद्वानों में उत्तम (शिरः) शिर के समान प्रशंसित व्याख्यान को (प्रति, वदत्) कहे ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जैसे माखी पृथिवी में उत्पन्न हुए वृक्ष वनस्पतियों से रस, जिसको सहत कहते हैं उसको, लेकर अपने निवासस्थान में इकट्ठा कर आनन्द करती है, वैसे ही योगविद्या के ऐश्वर्य्य को प्राप्त सत्य उपदेश से सुख का विधान करनेहारे ब्रह्म-विचार में स्थिर विद्वान् संन्यासी के समीप से सत्यशिक्षा को सुन, मान और विचार के सर्वदा तुम लोग सुखी होओ ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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