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Rigveda Mandal 1 / Sukta 119 / Mantra 7

191 Sukta
10 Mantra
1/119/7
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यु॒वं वन्द॑नं॒ निर्ऋ॑तं जर॒ण्यया॒ रथं॒ न द॑स्रा कर॒णा समि॑न्वथः। क्षेत्रा॒दा विप्रं॑ जनथो विप॒न्यया॒ प्र वा॒मत्र॑ विध॒ते दं॒सना॑ भुवत् ॥

यु॒वम् । वन्द॑नम् । निःऽऋ॑तम् । ज॒र॒ण्यया॑ । रथ॑म् । न । द॒स्रा॒ । क॒र॒णा । सम् । इ॒न्व॒थः॒ । क्षेत्रा॑त् । आ । विप्र॑म् । ज॒न॒थः॒ । वि॒प॒न्यया॑ । प्र । वा॒म् । अत्र॑ । वि॒ध॒ते । दं॒सना॑ । भु॒व॒त् ॥

Mantra without Swara
युवं वन्दनं निर्ऋतं जरण्यया रथं न दस्रा करणा समिन्वथः। क्षेत्रादा विप्रं जनथो विपन्यया प्र वामत्र विधते दंसना भुवत् ॥

युवम्। वन्दनम्। निःऽऋतम्। जरण्यया। रथम्। न। दस्रा। करणा। सम्। इन्वथः। क्षेत्रात्। आ। विप्रम्। जनथः। विपन्यया। प्र। वाम्। अत्र। विधते। दंसना। भुवत् ॥ १.११९.७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 21 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (करणा) उत्तम कर्मों के करने वा (दस्रा) दुःख दूर करनेवाले स्त्री पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (जरण्यया) विद्यावृद्ध अर्थात् अतीव विद्या पढ़े हुए विद्वानों के योग्य विद्या से युक्त (निर्ऋतम्) जिसमें निरन्तर सत्य विद्यमान (वन्दनम्) प्रशंसा करने योग्य (विप्रम्) विद्या और अच्छी शिक्षा के योग से उत्तम बुद्धिवाले विद्वान् को (रथम्) विमान आदि यान के (न) समान (समिन्वथः) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ और (क्षेत्रात्) गर्भ के ठहरने की जगह से उत्पन्न हुए सन्तान के समान अपने निवास से उत्तम काम को (आ, जनथः) अच्छे प्रकार प्रकट करो, जो (अत्र) इस संसार में (वाम्) तुम दोनों का गृहाश्रम के बीच सम्बन्ध (प्र, भुवत्) प्रबल हो उसमें (विपन्यया) प्रशंसा करने योग्य धर्म की नीति से युक्त (दंसना) कामों को (विधते) विधान करने को प्रवृत्त हुए मनुष्य के लिये उत्तम राज्य के अधिकारों को देओ ॥ ७ ॥
Essence
विचार करनेवाले स्त्रीपुरुष जन्म से लेके जब-तक ब्रह्मचर्य्य से समस्त विद्या ग्रहण करें तब तक उत्तम शिक्षा देकर सन्तानों को यथायोग्य व्यवहारों में निरन्तर युक्त करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।