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Rigveda Mandal 1 / Sukta 119 / Mantra 5

191 Sukta
10 Mantra
1/119/5
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वोर॑श्विना॒ वपु॑षे युवा॒युजं॒ रथं॒ वाणी॑ येमतुरस्य॒ शर्ध्य॑म्। आ वां॑ पति॒त्वं स॒ख्याय॑ ज॒ग्मुषी॒ योषा॑वृणीत॒ जेन्या॑ यु॒वां पती॑ ॥

यु॒वोः । अ॒श्वि॒ना॒ । वपु॑षे । यु॒वा॒ऽयुज॑म् । रथ॑म् । वानी॒ इति॑ । ये॒म॒तुः॒ । अ॒स्य॒ । शर्ध्य॑म् । आ । वा॒म् । प॒ति॒ऽत्वम् । स॒ख्याय॑ । ज॒ग्मुषी॑ । योषा॑ । अ॒वृण॒ी॒त॒ । जेन्या॑ । यु॒वाम् । पती॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
युवोरश्विना वपुषे युवायुजं रथं वाणी येमतुरस्य शर्ध्यम्। आ वां पतित्वं सख्याय जग्मुषी योषावृणीत जेन्या युवां पती ॥

युवोः। अश्विना। वपुषे। युवाऽयुजम्। रथम्। वाणी इति। येमतुः। अस्य। शर्ध्यम्। आ। वाम्। पतिऽत्वम्। सख्याय। जग्मुषी। योषा। अवृणीत। जेन्या। युवाम्। पती इति ॥ १.११९.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 20 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सभासेनाधीशो ! (युवोः) तुम अपने (शर्ध्यम्) बलों से युक्त (युवायुजम्) तुमने जोड़े (रथम्) मनोहर सेना आदि युक्त यान को (अस्य) इस राजकार्य के बीच में स्थिर हुए (वाणी) उपदेश करनेवालों के समान (वपुषे) अच्छे रूप के होने के लिये (येमतुः) नियम में रखते हो (वाम्) तुम दोनों के (सख्याय) मित्रपन अर्थात् अतीव प्रीति के लिये (जेन्या) नियम करते हुओं में श्रेष्ठ (पती) पालना करनेहारे (युवाम्) तुम्हारे साथ (पतित्वम्) पतिभाव को (जग्मुषी) प्राप्त होनेवाली (योषा) यौवन अवस्था से परिपूर्ण ब्रह्मचारिणी युवति स्त्री तुममें से अपने मन से चाहे हुए पति को (आ, अवृणीत) अच्छे प्रकार वरे ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ब्रह्मचर्य्य करके यौवन अवस्था को पाए हुए विदुषी कुमारी कन्या अपने को प्यारे पति को पाय निरन्तर उसकी सेवा करती है और जैसे ब्रह्मचर्य को किये हुए ज्वान पुरुष अपनी प्रीति के अनुकूल चाही हुई स्त्री को पाकर आनन्दित होता है। वैसे ही सभा और सेनापति सदा होवें ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।