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Rigveda Mandal 1 / Sukta 119 / Mantra 4

191 Sukta
10 Mantra
1/119/4
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यु॒वं भु॒ज्युं भु॒रमा॑णं॒ विभि॑र्ग॒तं स्वयु॑क्तिभिर्नि॒वह॑न्ता पि॒तृभ्य॒ आ। या॒सि॒ष्टं व॒र्तिर्वृ॑षणा विजे॒न्यं१॒॑ दिवो॑दासाय॒ महि॑ चेति वा॒मव॑: ॥

यु॒वम् । भु॒ज्युम् । भु॒रमा॑णम् । विऽभिः॑ । ग॒तम् । स्वयु॑क्तिऽभिः । नि॒ऽवह॑न्ता । पि॒तृऽभ्यः॑ । आ । या॒सि॒ष्टम् । व॒र्तिः । वृ॒ष॒णा॒ । वि॒ऽजे॒न्य॑म् । दिवः॑ऽदासाय । महि॑ । चे॒ति॒ । वा॒म् । अवः॑ ॥

Mantra without Swara
युवं भुज्युं भुरमाणं विभिर्गतं स्वयुक्तिभिर्निवहन्ता पितृभ्य आ। यासिष्टं वर्तिर्वृषणा विजेन्यं१ दिवोदासाय महि चेति वामव: ॥

युवम्। भुज्युम्। भुरमाणम्। विऽभिः। गतम्। स्वयुक्तिऽभिः। निऽवहन्ता। पितृऽभ्यः। आ। यासिष्टम्। वर्तिः। वृषणा। विऽजेन्यम्। दिवःऽदासाय। महि। चेति। वाम्। अवः ॥ १.११९.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
हे (वृषणा) सुख वर्षाने और सब गुणों में रमनेहारे सभासेनाधीशो ! (युवम्) तुम दोनों (वाम्) अपनी (भुरमाणम्) पुष्टि करनेवाले (भुज्युम्) भोजन करने के योग्य पदार्थ को (विभिः) पक्षियों ने (गतम्) पाये हुए के समान (स्वयुक्तिभिः) अपनी रीतियों से (पितृभ्यः) राज्य की पालना करनेहारे वीरों के लिये (निवहन्ता) निरन्तर पहुँचाते हुए (महि) अतीव (अवः) रक्षा करनेवाले पदार्थ और (वर्त्तिः) जो सेनासमूह (चेति) जाना जाय, उसको भी लेकर (दिवोदासाय) विद्या का प्रकाश देनेवाले सेनाध्यक्ष के लिये (विजेन्यम्) जीतने योग्य शत्रुसेनासमूह को (आ, यासिष्टम्) प्राप्त होओ ॥ ४ ॥
Essence
सेनापतियों से जो सेनासमूह हृष्ट-पुष्ट अर्थात् चैनचान से भरा-पूरा खाने-पीने से पुष्ट अपने को चाहता हुआ जान पड़े, उसको अनेक प्रकार के भोग और अच्छी सिखावट से युक्त कर अर्थात् उक्त पदार्थ उनको देकर आगे होनेवाले लाभ के लिये प्रवृत्त करा, ऐसे सेनासमूह से युद्धकर शत्रु जन जीते जा सकते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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