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Rigveda Mandal 1 / Sukta 119 / Mantra 2

191 Sukta
10 Mantra
1/119/2
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् दैर्घतमसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऊ॒र्ध्वा धी॒तिः प्रत्य॑स्य॒ प्रया॑म॒न्यधा॑यि॒ शस्म॒न्त्सम॑यन्त॒ आ दिश॑:। स्वदा॑मि घ॒र्मं प्रति॑ यन्त्यू॒तय॒ आ वा॑मू॒र्जानी॒ रथ॑मश्विनारुहत् ॥

ऊ॒र्ध्वा । धी॒तिः । प्रति॑ । अ॒स्य॒ । प्रऽया॑मनि । अधा॑यि । शस्म॑न् । सम् । अ॒य॒न्ते॒ । आ । दिशः॑ । स्वदा॑मि । घ॒र्मम् । प्रति॑ । य॒न्ति॒ । ऊ॒तयः॑ । आ । वा॒म् । ऊ॒र्जानी॑ । रथ॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । अ॒रु॒ह॒त् ॥

Mantra without Swara
ऊर्ध्वा धीतिः प्रत्यस्य प्रयामन्यधायि शस्मन्त्समयन्त आ दिश:। स्वदामि घर्मं प्रति यन्त्यूतय आ वामूर्जानी रथमश्विनारुहत् ॥

ऊर्ध्वा। धीतिः। प्रति। अस्य। प्रऽयामनि। अधायि। शस्मन्। सम्। अयन्ते। आ। दिशः। स्वदामि। घर्मम्। प्रति। यन्ति। ऊतयः। आ। वाम्। ऊर्जानी। रथम्। अश्विना। अरुहत् ॥ १.११९.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सभासेनाधीशो ! (वाम्) तुम दोनों की (शस्मन्) प्रशंसा के योग्य (प्रयामनि) अति उत्तम यात्रा में जो (ऊर्जानि) पराक्रमयुक्त नीति और (ऊर्ध्वा, धीतिः) उन्नतियुक्त धारणा वा ऊँची धारणा जिन मनुष्यों ने (अधायि) धारण की वे (दिशः) दान आदि उत्तम कर्म करनेहारे मनुष्य (सम्, आ, अयन्ते) भली-भाँति आते हैं। जिस (रथम्) मनोहर विमान आदि यान का शिल्पी कारुक जन (आ, अरुहत्) आरोहण करता अर्थात् उसपर चढ़ता है उसपर तुम लोग चढ़ो। जिस (घर्मम्) उज्ज्वल सुगन्धियुक्त भोजन करने योग्य पदार्थ को (ऊतयः) मनोहर रक्षा आदि व्यवहार हम लोगों के लिये (यन्ति) प्राप्त करते हैं उसको (प्रति) तुम प्राप्त होओ और जिस उज्ज्वल सुगन्धियुक्त भोजन करने योग्य पदार्थ का मैं (स्वदामि) स्वाद लेऊँ (अस्य) इसके स्वाद को तुम (प्रति) प्रतीति से प्राप्त होओ ॥ २ ॥
Essence
हे मनुष्यो ! तुम अच्छे बने हुए, रोगों का विनाश करने और बल के देनेहारे अन्नों को भोगो। यात्रा में सब सामग्री को लेकर एक दूसरे से प्रीति और रक्षा कर-करा देश-परदेश को जाओ पर कहीं नीति को न छोड़ो ॥ २ ॥
Subject
फिर मनुष्य क्या करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।