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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/118/9
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वं श्वे॒तं पे॒दव॒ इन्द्र॑जूतमहि॒हन॑मश्विनादत्त॒मश्व॑म्। जो॒हूत्र॑म॒र्यो अ॒भिभू॑तिमु॒ग्रं स॑हस्र॒सां वृष॑णं वी॒ड्व॑ङ्गम् ॥

यु॒वम् । श्वे॒तम् । पे॒दवे॑ । इन्द्र॑ऽजूतम् । अ॒हि॒ऽहन॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । अ॒द॒त्त॒म् । अश्व॑म् । जो॒हूत्र॑म् । अ॒र्यः । अ॒भिऽभू॑तिम् । उ॒ग्रम् । स॒ह॒स्र॒ऽसाम् । वृष॑णम् । वी॒ळुऽअ॑ङ्गम् ॥

Mantra without Swara
युवं श्वेतं पेदव इन्द्रजूतमहिहनमश्विनादत्तमश्वम्। जोहूत्रमर्यो अभिभूतिमुग्रं सहस्रसां वृषणं वीड्वङ्गम् ॥

युवम्। श्वेतम्। पेदवे। इन्द्रऽजूतम्। अहिऽहनम्। अश्विना। अदत्तम्। अश्वम्। जोहूत्रम्। अर्यः। अभिऽभूतिम्। उग्रम्। सहस्रऽसाम्। वृषणम्। वीळुऽअङ्गम् ॥ १.११८.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) यज्ञादि कर्म करानेवाली स्त्री और समस्त लोकों के अधिपति पुरुष ! (युवम्) तुम दोनों (पेदवे) जाने-आने के लिये जो (अर्य्यः) सबका स्वामी सब सभाओं का प्रधान राजा (इन्द्रजूतम्) सभाध्यक्ष राजा ने प्रेरणा किये (जोहूत्रम्) अत्यन्त ईर्ष्या करते वा शत्रुओं को घिसते हुए (वृषणम्) शत्रुओं की सेना पर शस्त्र और अस्त्रों की वर्षा करानेवाले (वीड्वङ्गम्) बली, पोढ़े अङ्गों से युक्त (उग्रम्) दुष्ट शत्रुजनों से नहीं सहे जाते (अभिभूतिम्) और शत्रुओं का तिरस्कार करने (सहस्रसाम्) वा हजारों कामों को सेवनेवाले (श्वेतम्) सुपेद (अश्वम्) सभों में व्याप्त बिजुली रूप आग को (अहिहनम्) मेघ के छिन्न-भिन्न करनेवाले सूर्य्य के समान तुम दोनों के लिये देता है, उसके लिये निरन्तर सुख (अदत्तम्) देओ ॥ ९ ॥
Essence
जैसे सूर्य्य मेघ को वर्षा के सब प्रजा के लिये सुख देता है, वैसे शिल्पविद्या के जाननेवाले स्त्री-पुरुष समस्त प्रजा के लिये सुख देवें और अपने बीच में जो अतिरथी वीर स्त्री-पुरुष हैं, उनका सदा सत्कार करें ॥ ९ ॥
Subject
अब बिजुली की विद्या को स्त्री-पुरुष ग्रहण करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।