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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 8

191 Sukta
11 Mantra
1/118/8
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वं धे॒नुं श॒यवे॑ नाधि॒तायापि॑न्वतमश्विना पू॒र्व्याय॑। अमु॑ञ्चतं॒ वर्ति॑का॒मंह॑सो॒ निः प्रति॒ जङ्घां॑ वि॒श्पला॑या अधत्तम् ॥

यु॒वम् । धे॒नुम् । श॒यवे॑ । ना॒धि॒ताय॑ । अपि॑न्वतम् । अ॒श्वि॒ना॒ । पू॒र्व्याय॑ । अमु॑ञ्चतम् । वर्ति॑काम् । अंह॑सः । निः । प्रति॑ । जङ्घा॑म् । वि॒श्पला॑याः । अ॒ध॒त्त॒म् ॥

Mantra without Swara
युवं धेनुं शयवे नाधितायापिन्वतमश्विना पूर्व्याय। अमुञ्चतं वर्तिकामंहसो निः प्रति जङ्घां विश्पलाया अधत्तम् ॥

युवम्। धेनुम्। शयवे। नाधिताय। अपिन्वतम्। अश्विना। पूर्व्याय। अमुञ्चतम्। वर्तिकाम्। अंहसः। निः। प्रति। जङ्घाम्। विश्पलायाः। अधत्तम् ॥ १.११८.८

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) अच्छी सीख पाये हुए समस्त विद्याओं में रमते हुए स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (नाधिताय) ऐश्वर्य्ययुक्त (पूर्व्याय) अगले विद्वानों ने किये हुए (शयवे) जो कि सुख से सोता है उस विद्वान् के लिये (धेनुम्) अच्छी सीख दी हुई वाणी को (अपिन्वतम्) सेवन करो, जिसको (अंहसः) अधर्म के आचरण से (निरमुञ्चतम्) निरन्तर छुड़ाओ उससे (विश्पलायाः) प्रजाजनों की पालना के लिये (जङ्घाम्) सब सुखों की उत्पन्न करनेवाली (वर्त्तिकाम्) विनय, नम्रता आदि गुणों के सहित उत्तम नीति को (प्रत्यधत्तम्) प्रतीति से धारण करो ॥ ८ ॥
Essence
राजपुरुष सब ऐश्वर्ययुक्त परस्पर धनीजनों के कुल में हुए प्रजाजनों को सत्यन्याय से सन्तोष दे उनको ब्रह्मचर्य के नियम से विद्या ग्रहण करने के लिये प्रवृत्त करावें, जिससे किसी का लड़का और लड़की विद्या और उत्तम शिक्षा के विना न रह जाय ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।