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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 7

191 Sukta
11 Mantra
1/118/7
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वमत्र॒येऽव॑नीताय त॒प्तमूर्ज॑मो॒मान॑मश्विनावधत्तम्। यु॒वं कण्वा॒यापि॑रिप्ताय॒ चक्षु॒: प्रत्य॑धत्तं सुष्टु॒तिं जु॑जुषा॒णा ॥

यु॒वम् । अत्र॑ये । अव॑ऽनीताय । त॒प्तम् । ऊर्ज॑म् । ओ॒मान॑म् । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒ध॒त्त॒म् । यु॒वम् । कण्वा॑य । अपि॑ऽरिप्ताय । चक्षुः॑ । प्रति॑ । अ॒ध॒त्त॒म् । सु॒ऽष्टु॒तिम् । जु॒जु॒षा॒णा ॥

Mantra without Swara
युवमत्रयेऽवनीताय तप्तमूर्जमोमानमश्विनावधत्तम्। युवं कण्वायापिरिप्ताय चक्षु: प्रत्यधत्तं सुष्टुतिं जुजुषाणा ॥

युवम्। अत्रये। अवऽनीताय। तप्तम्। ऊर्जम्। ओमानम्। अश्विनौ। अधत्तम्। युवम्। कण्वाय। अपिऽरिप्ताय। चक्षुः। प्रति। अधत्तम्। सुऽष्टुतिम्। जुजुषाणा ॥ १.११८.७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 19 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जुजुषाणा) सेवा वा प्रीति को प्राप्त (अश्विनौ) समस्त गुणों में व्याप्त स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (अवनीताय) अविद्या अज्ञान के दूर होने (अपिरिप्ताय) और समस्त विद्याओं के बढ़ने के लिये (अत्रये) जिसको तीन प्रकार का दुःख नहीं है, उस (कण्वाय) बुद्धिमान् के लिये (तप्तम्) तपस्या से उत्पन्न हुए (ओमानम्) रक्षा आदि अच्छे कामों की पालना करनेवाले (ऊर्जम्) पराक्रम को (अधत्तम्) धारण करो और (युवम्) तुम दोनों उससे (चक्षुः) सकल व्यवहारों के दिखलानेहारे उत्तम ज्ञान और (सुष्टुतिम्) सुन्दर प्रशंसा को (प्रति, अधत्तम्) प्रतीति के साथ धारण करो ॥ ७ ॥
Essence
सभासेनाधीश आदि राजपुरषों को चाहिये कि धर्मात्मा जो कि वेद आदि विद्या के प्रचार के लिये अच्छा यत्न करते हैं, उन विद्वानों की रक्षा का विधान कर उनसे विनय को पाकर प्रजाजनों की पालना करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।