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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 5

191 Sukta
11 Mantra
1/118/5
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वां॒ रथं॑ युव॒तिस्ति॑ष्ठ॒दत्र॑ जु॒ष्ट्वी न॑रा दुहि॒ता सूर्य॑स्य। परि॑ वा॒मश्वा॒ वपु॑षः पत॒ङ्गा वयो॑ वहन्त्वरु॒षा अ॒भीके॑ ॥

आ । वा॒म् । रथ॑म् । यु॒व॒तिः । ति॒ष्ठ॒त् । अत्र॑ । जु॒ष्ट्वी । न॒रा॒ । दु॒हि॒ता । सूर्य॑स्य । परि॑ । वा॒म् । अश्वाः॑ । वपु॑षः । प॒त॒ङ्गाः । वयः॑ । व॒ह॒न्तु॒ । अ॒रु॒षाः । अ॒भीके॑ ॥

Mantra without Swara
आ वां रथं युवतिस्तिष्ठदत्र जुष्ट्वी नरा दुहिता सूर्यस्य। परि वामश्वा वपुषः पतङ्गा वयो वहन्त्वरुषा अभीके ॥

आ। वाम्। रथम्। युवतिः। तिष्ठत्। अत्र। जुष्ट्वी। नरा। दुहिता। सूर्यस्य। परि। वाम्। अश्वाः। वपुषः। पतङ्गाः। वयः। वहन्तु। अरुषाः। अभीके ॥ १.११८.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (नरा) सबके नायक सभासेनाधीशो ! (वपुषः) सुन्दर रूप की (जुष्ट्वी) प्रीति को पाए हुए वा सुन्दर रूप की सेवा करती सुन्दरी (युवतिः) नवयौवना (दुहिता) कन्या (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की किरण जो प्रातःसमय की वेला जैसे पृथिवी पर ठहरे वैसे (वाम्) तुम दोनों के (रथम्) रथ पर (आ, तिष्ठत्) आ बैठे (अत्र) इस (अभीके) संग्राम में (पतङ्गाः) गमन करते हुए (अरुषाः) लाल रङ्गवाले (वयः) पखेरूओं के समान (अश्वाः) शीघ्रगामी अग्नि आदि पदार्थ (वाम्) तुम दोनों को (परि, वहन्तु) सब ओर से पहुँचायें ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य की किरणें सब ओर से आती-जाती हैं वा जैसे पतिव्रता उत्तम स्त्री पति को सुख पहुँचाती है वा जैसे पखेरू ऊपर-नीचे जाते हैं, वैसे युद्ध में उत्तम यान और उत्तम वीर जन चाहे हुए सुख को सिद्ध करते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।