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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 4

191 Sukta
11 Mantra
1/118/4
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ वां॑ श्ये॒नासो॑ अश्विना वहन्तु॒ रथे॑ यु॒क्तास॑ आ॒शव॑: पत॑ङ्गाः। ये अ॒प्तुरो॑ दि॒व्यासो॒ न गृध्रा॑ अ॒भि प्रयो॑ नासत्या॒ वह॑न्ति ॥

आ । वा॒म् । श्ये॒नासः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । व॒ह॒न्तु॒ । रथे॑ । यु॒क्तासः॑ । आ॒शवः॑ । प॒त॒ङ्गाः । ये । अ॒प्ऽतुरः॑ । दि॒व्यासः॑ । न । गृध्राः॑ । अ॒भि । प्रयः॑ । ना॒स॒त्या॒ । वह॑न्ति ॥

Mantra without Swara
आ वां श्येनासो अश्विना वहन्तु रथे युक्तास आशव: पतङ्गाः। ये अप्तुरो दिव्यासो न गृध्रा अभि प्रयो नासत्या वहन्ति ॥

आ। वाम्। श्येनासः। अश्विना। वहन्तु। रथे। युक्तासः। आशवः। पतङ्गाः। ये। अप्ऽतुरः। दिव्यासः। न। गृध्राः। अभि। प्रयः। नासत्या। वहन्ति ॥ १.११८.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 4

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Meaning
हे (नासत्या) सत्य के साथ वर्त्तमान (अश्विना) सब विद्याओं में व्याप्त स्त्री पुरुषो ! (ये) जो (अप्तुरः) अन्तरिक्ष में शीघ्रता करने (दिव्यासः) और अच्छे खेलनेवाले (गृध्राः) गृध्र पखेरुओं के (न) समान (प्रयः) प्रीति किये अर्थात् चाहे हुए स्थान को (अभि, वहन्ति) सब ओर से पहुँचाते हैं वे (श्येनासः) वाज पखेरू के समान चलने (पतङ्गाः) सूर्य के समान निरन्तर प्रकाशमान (आशवः) और शीघ्रतायुक्त घोड़ों के समान अग्नि आदि पदार्थ (रथे) विमानादि रथ में (युक्तासः) युक्त किये हुए (वाम्) तुम दोनों को (आ, वहन्ति) पहुँचाते हैं ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे स्त्री-पुरुषो ! जैसे आकाश में अपने पङ्खों से उड़ते हुए गृध्र आदि पखेरू सुख से आते-जाते हैं, वैसे ही तुम अच्छे सिद्ध किये विमान आदि यानों से अन्तरिक्ष में आओ-जाओ ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे स्त्री-पुरुष क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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