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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/118/3
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र॒वद्या॑मना सु॒वृता॒ रथे॑न॒ दस्रा॑वि॒मं शृ॑णुतं॒ श्लोक॒मद्रे॑:। किम॒ङ्ग वां॒ प्रत्यव॑र्तिं॒ गमि॑ष्ठा॒हुर्विप्रा॑सो अश्विना पुरा॒जाः ॥

प्र॒वत्ऽया॑मना । सु॒ऽवृता॑ । रथे॑न । द॒स्रौ॒ । इ॒मम् । शृ॒णु॒त॒म् । श्लोक॑म् । अद्रेः॑ । किम् । अ॒ङ्ग । वा॒म् । प्रति॑ । अव॑र्तिम् । गमि॑ष्ठा । आ॒हुः । विप्रा॑सः । अ॒श्वि॒ना॒ । पु॒रा॒ऽजाः ॥

Mantra without Swara
प्रवद्यामना सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रे:। किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः ॥

प्रवत्ऽयामना। सुऽवृता। रथेन। दस्रौ। इमम्। शृणुतम्। श्लोकम्। अद्रेः। किम्। अङ्ग। वाम्। प्रति। अवर्तिम्। गमिष्ठा। आहुः। विप्रासः। अश्विना। पुराऽजाः ॥ १.११८.३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्रवद्यामना) भली-भाँति चलनेवाले (सुवृता) अच्छे-अच्छे साधनों से युक्त (रथेन) विमान आदि रथ से (अद्रेः) पर्वत के ऊपर जाने और (दस्रौ) दान आदि उत्तम कामों के करनेवाले (अश्विना) सभासेनाधीशो वा हे स्त्री-पुरुषो ! (वाम्) तुम दोनों (इमम्) इस (श्लोकम्) वाणी को (शृणुतम्) सुनो कि (अङ्ग) हे उक्त सज्जनो ! (पुराजाः) अगले वृद्ध (विप्रासः) उत्तम बुद्धिवाले विद्वान् जन (गमिष्ठा) अति चलते हुए तुम दोनों के (प्रति) प्रति (किम्) किस (अवर्त्तिम्) न वर्त्तने न कहने योग्य निन्दित व्यवहार का (आहुः) उपदेश करते हैं अर्थात् कुछ भी नहीं ॥ ३ ॥
Essence
हे राजा आदि स्त्री-पुरुषो ! तुम जो-जो उत्तम विद्वानों ने उपदेश किया उसी-उसी को स्वीकार करो क्योंकि सत्पुरुषों के उपदेश के विना संसार में मनुष्यों की उन्नति नहीं होती। जहाँ उत्तम विद्वानों के उपदेश नहीं प्रवृत्त होते हैं, वहाँ सब अज्ञानरूपी अंधेरे से ढपे ही होकर पशुओं के समान वर्त्तावकर दुःख को इकट्ठा करते हैं ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।