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Rigveda Mandal 1 / Sukta 118 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/118/2
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्रि॒व॒न्धु॒रेण॑ त्रि॒वृता॒ रथे॑न त्रिच॒क्रेण॑ सु॒वृता या॑तम॒र्वाक्। पिन्व॑तं॒ गा जिन्व॑त॒मर्व॑तो नो व॒र्धय॑तमश्विना वी॒रम॒स्मे ॥

त्रि॒ऽव॒न्धु॒रेण॑ । त्रि॒ऽवृत॑ । रथे॑न । त्रि॒ऽच॒क्रेण॑ । सु॒ऽवृता॑ । आ । या॒त॒म् । अ॒र्वाक् । पिन्व॑तम् । गाः । जिन्व॑तम् । अर्व॑तः । नः॒ । व॒र्धय॑तम् । अ॒श्वि॒ना॒ । वी॒रम् । अ॒स्मे इति॑ ॥

Mantra without Swara
त्रिवन्धुरेण त्रिवृता रथेन त्रिचक्रेण सुवृता यातमर्वाक्। पिन्वतं गा जिन्वतमर्वतो नो वर्धयतमश्विना वीरमस्मे ॥

त्रिऽवन्धुरेण। त्रिऽवृत। रथेन। त्रिऽचक्रेण। सुऽवृता। आ। यातम्। अर्वाक्। पिन्वतम्। गाः। जिन्वतम्। अर्वतः। नः। वर्धयतम्। अश्विना। वीरम्। अस्मे इति ॥ १.११८.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 18 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सभासेनाधीशो ! तुम दोनों (त्रिवन्धुरेण) जो तीन प्रकार के बन्धनों से युक्त (त्रिचक्रेण) जिसमें कलों के तीन चक्कर लगे (त्रिवृता) और तीन ओढ़ने के वस्त्रों से युक्त जो (सुवृता) अच्छे-अच्छे मनुष्य शृङ्गारों के साथ वर्त्तमान (रथेन) रथ है उससे (अर्वाक्) भूमि के नीचे (आ, यातम्) आओ, (नः) हम लोगों की (गाः) पृथिवी में जो भूमि हैं उनका (पिन्वतम्) सेवन करो, (अर्वतः) राज्य पाये हुए मनुष्य वा घोड़ों को (जिन्वतम्) जी आओ सुख देओ, (अस्मे) हम लोगों को और हम लोगों के (वीरम्) शूरवीर पुरुष को (वर्द्धयतम्) बढ़ाओ वृद्धि देओ ॥ २ ॥
Essence
राजपुरुष अच्छी सामग्री और उत्तम शास्त्रवेत्ता विद्वानों का सहाय ले सब स्त्री-पुरुषों को समृद्धि और सिद्धियुक्त करके प्रशंसित हों ॥ २ ॥
Subject
फिर राज्य के सहाय से स्त्री-पुरुष के विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।