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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 7

191 Sukta
25 Mantra
1/117/7
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वं न॑रा स्तुव॒ते कृ॑ष्णि॒याय॑ विष्णा॒प्वं॑ ददथु॒र्विश्व॑काय। घोषा॑यै चित्पितृ॒षदे॑ दुरो॒णे पतिं॒ जूर्य॑न्त्या अश्विनावदत्तम् ॥

यु॒वम् । न॒रा॒ । स्तु॒व॒ते । कृ॒ष्णि॒याय॑ । वि॒ष्णा॒प्व॑म् । द॒द॒थुः॒ । विश्व॑काय । घोषा॑यै । चि॒त् । पि॒तृ॒ऽसदे॑ । दु॒रो॒णे । पति॑म् । जूर्य॑न्त्यै । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒द॒त्त॒म् ॥

Mantra without Swara
युवं नरा स्तुवते कृष्णियाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय। घोषायै चित्पितृषदे दुरोणे पतिं जूर्यन्त्या अश्विनावदत्तम् ॥

युवम्। नरा। स्तुवते। कृष्णियाय। विष्णाप्वम्। ददथुः। विश्वकाय। घोषायै। चित्। पितृऽसदे। दुरोणे। पतिम्। जूर्यन्त्यै। अश्विनौ। अदत्तम् ॥ १.११७.७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 2

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Meaning
हे (नरा) सब कामों में प्रधान और (अश्विनौ) सब विद्याओं में व्याप्त सभासेनाधीशो ! (युवम्) तुम दोनों (कृष्णियाय) खेती के काम की योग्यता रखने और (स्तुवते) सत्य बोलनेवाले (पितृषदे) जिसके समीप विद्या विज्ञान देनेवाले स्थित होते (विश्वकाय) और जो सभों पर दया करता है उस राजा के लिये (दुरोणे) घर में (विष्णाप्वम्) जिस पुरुष से खेती के भरे हुए कामों को प्राप्त होता उस खेती रखनेवाले पुरुष को (ददथुः) देओ (चित्) और (जूर्य्यन्त्यै) बुड्ढेपन को प्राप्त करनेवाली (घोषायै) जिसमें प्रशंसित शब्द वा गौ आदि के रहने के विशेष स्थान हैं, उस खेती के लिये (पतिम्) स्वामी अर्थात् उसकी रक्षा करनेवाले को (अदत्तम्) देओ ॥ ७ ॥
Essence
राजा आदि न्यायाधीश खेती आदि कामों के करनेवाले पुरुषों से सब उपकार पालना करनेवाले पुरुष और सत्य न्याय को प्रजाजनों को देकर उन्हें पुरुषार्थ में प्रवृत्त करें। इन कार्य्यों की सिद्धि को प्राप्त हुए प्रजाजनों से धर्म के अनुकूल अपने भाग को यथायोग्य ग्रहण करें ॥ ७ ॥
Subject
फिर अध्यापक और उपदेश करनेवालों के गुण अगले मन्त्र में कहते हैं ।

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