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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 6

191 Sukta
25 Mantra
1/117/6
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तद्वां॑ नरा॒ शंस्यं॑ पज्रि॒येण॑ क॒क्षीव॑ता नासत्या॒ परि॑ज्मन्। श॒फादश्व॑स्य वा॒जिनो॒ जना॑य श॒तं कु॒म्भाँ अ॑सिञ्चतं॒ मधू॑नाम् ॥

तत् । वा॒म् । न॒रा॒ । शंस्य॑म् । प॒ज्रि॒येण॑ । क॒क्षीव॑ता । ना॒स॒त्या॒ । परि॑ज्मन् । श॒फात् । अश्व॑स्य । वा॒जिनः॑ । जना॑य । श॒तम् । कु॒म्भान् । अ॒सि॒ञ्च॒त॒म् । मधू॑नाम् ॥

Mantra without Swara
तद्वां नरा शंस्यं पज्रियेण कक्षीवता नासत्या परिज्मन्। शफादश्वस्य वाजिनो जनाय शतं कुम्भाँ असिञ्चतं मधूनाम् ॥

तत्। वाम्। नरा। शंस्यम्। पज्रियेण। कक्षीवता। नासत्या। परिज्मन्। शफात्। अश्वस्य। वाजिनः। जनाय। शतम्। कुम्भान्। असिञ्चतम्। मधूनाम् ॥ १.११७.६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 14 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (पज्रियेण) प्राप्त होने योग्यों में प्रसिद्ध हुए (कक्षीवता) शिक्षा करनेहारे विद्वान् के साथ वर्त्तमान (नासत्या) सत्य व्यवहार वर्त्तनेवाले (नरा) मनुष्यों में उत्तम सबको अपने-अपने ढंग में लगानेहारे सभासेनाधीशो ! तुम दोनों जो (परिज्मन्) सब प्रकार से जिसमें जाते हैं उस मार्ग को (वाजिनः) वेगवान् (अश्वस्य) घोड़ा की (शफात्) टाप के समान बिजुली के वेग से (जनाय) अच्छे गुणों और उत्तम विद्याओं में प्रसिद्ध हुए विद्वान् के लिये (मधूनाम्) जलों के (शतम्) सैकड़ों (कुम्भान्) घड़ों को (असिञ्चतम्) सुख से सींचो अर्थात् भरो (तत्) उस (वाम्) तुम लोगों के (शंस्यम्) प्रशंसा करने योग्य काम को हम जानते हैं ॥ ६ ॥
Essence
राजपुरुषों को चाहिये कि मनुष्य आदि प्राणियों के सुख के लिये मार्ग में अनेक घड़ों के जल से नित्य सींचाव कराया करें, जिससे घोड़े, बैल आदि के पैरों की खूदन से धूर न उड़े। और जिससे मार्ग में अपनी सेना के जन सुख से आवें-जावें। इस प्रकार ऐसे प्रशंसित कामों को करके प्रजाजनों को निरन्तर आनन्द देवें ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।