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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 5

191 Sukta
25 Mantra
1/117/5
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सु॒षु॒प्वांसं॒ न निर्ॠ॑तेरु॒पस्थे॒ सूर्यं॒ न द॑स्रा॒ तम॑सि क्षि॒यन्त॑म्। शु॒भे रु॒क्मं न द॑र्श॒तं निखा॑त॒मुदू॑पथुरश्विना॒ वन्द॑नाय ॥

सु॒षु॒प्वांस॑म् । न । निःऽऋ॑तेः । उ॒पऽस्थे॑ । सूर्य॑म् । न । द॒स्रा॒ । तम॑सि । क्षि॒यन्त॑म् । शु॒भे । रु॒क्मम् । न । द॒र्श॒तम् । निऽखा॑तम् । उत् । ऊ॒प॒थुः॒ । अ॒श्वि॒ना॒ । वन्द॑नाय ॥

Mantra without Swara
सुषुप्वांसं न निर्ॠतेरुपस्थे सूर्यं न दस्रा तमसि क्षियन्तम्। शुभे रुक्मं न दर्शतं निखातमुदूपथुरश्विना वन्दनाय ॥

सुषुप्वांसम्। न। निःऽऋतेः। उपऽस्थे। सूर्यम्। न। दस्रा। तमसि। क्षियन्तम्। शुभे। रुक्मम्। न। दर्शतम्। निऽखातम्। उत्। ऊपथुः। अश्विना। वन्दनाय ॥ १.११७.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 5

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Meaning
हे (दस्रा) दुःख का विनाश करनेवाले (अश्विना) कृषि कर्म को विद्या में परिपूर्ण सभा सेनाधीशो ! तुम दोनों (वन्दनाय) प्रशंसा करने के लिये (निर्ऋतेः) भूमि के (उपस्थे) ऊपर (तमसि) रात्रि में (क्षियन्तम्) निवास करते और (सुषुप्वांसम्) सुख से सोते हुए के (न) समान वा (सूर्य्यम्) सूर्य के (न) समान और (शुभे) शोभा के लिये (रुक्मम्) सुवर्ण के (न) समान (दर्शतम्) देखने योग्य रूप (निखातम्) फारे से जोते हुए खेत को (उदूपथुः) ऊपर से बोओ ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में तीन उपमालङ्कार हैं। जैसे प्रजास्थ जन अच्छे राज्य को पाकर रात्रि में सुख से सोके दिन में चाहे हुए कामों में मन लगाते हैं वा अच्छी शोभा होने के लिये सुवर्ण आदि वस्तुओं को पाते वा खेती आदि कामों को करते हैं, वैसे अच्छी प्रजा को प्राप्त होकर राजपुरुष प्रशंसा पाते हैं ॥ ५ ॥
Subject
अब अगले मन्त्र में राजधर्म विषय को कहते हैं ।

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