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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 4

191 Sukta
25 Mantra
1/117/4
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अश्वं॒ न गू॒ळ्हम॑श्विना दु॒रेवै॒ॠषिं॑ नरा वृषणा रे॒भम॒प्सु। सं तं रि॑णीथो॒ विप्रु॑तं॒ दंसो॑भि॒र्न वां॑ जूर्यन्ति पू॒र्व्या कृ॒तानि॑ ॥

अश्व॑म् । न । गू॒ळ्हम् । अ॒श्वि॒ना॒ । दुः॒ऽएवैः॑ । ऋषि॑म् । न॒रा॒ । वृ॒ष॒णा॒ । रे॒भम् । अ॒प्ऽसु । सम् । तम् । रि॒णी॒थः॒ । विऽप्रु॑तम् । दंसः॑ऽभिः । न । वा॒म् । जू॒र्य॒न्ति॒ । पू॒र्व्या । कृ॒तानि॑ ॥

Mantra without Swara
अश्वं न गूळ्हमश्विना दुरेवैॠषिं नरा वृषणा रेभमप्सु। सं तं रिणीथो विप्रुतं दंसोभिर्न वां जूर्यन्ति पूर्व्या कृतानि ॥

अश्वम्। न। गूळ्हम्। अश्विना। दुःऽएवैः। ऋषिम्। नरा। वृषणा। रेभम्। अप्ऽसु। सम्। तम्। रिणीथः। विऽप्रुतम्। दंसःऽभिः। न। वाम्। जूर्यन्ति। पूर्व्या। कृतानि ॥ १.११७.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 4

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Meaning
हे (नरा) सुख की प्राप्ति (वृषणा) और विद्या की वर्षा करानेवाले (अश्विना) सभा सेनापतियो ! तुम दोनों (दुरेवैः) दुःख को पहुँचानेवाले दुष्ट मनुष्य आदि प्राणियों (दंसोभिः) और श्रेष्ठ विद्वानों ने आचरण किये हुए कर्मों से ताड़ना को प्राप्त (अश्वम्) अति चलनेवाली बिजुली के समान (विप्रुतम्) विविध प्रकार अच्छे व्यवहारों को जानने (रेभम्) समस्त विद्या गुणों की प्रशंसा करने (अप्सु) विद्या में व्याप्त होने और वेदादि शास्त्रों में निश्चय रखनेवाले (तम्) उस पूर्व मन्त्र में कहे हुए (ऋषिम्) वेद पारगन्ता विद्वान् के (न) समान (गूढम्) अपने आशय को गुप्त रखनेवाले सज्जन पुरुष को सुख से (सं, रिणीथः) अच्छे प्रकार युक्त करो, जिससे (वाम्, पूर्व्या, कृतानि) तुम लोगों के जो पूर्वजों ने किए हुए विद्याप्रचाररूप काम वे (न) नहीं (जूर्य्यन्ति) जीर्ण होते अर्थात् नाश को नहीं प्राप्त होते ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। राजपुरुषों से जैसे डाकुओं द्वारा हरे छिपे हुए स्थान में ठहराये और पीड़ा दिये हुए घोड़े को लेकर वह सुख के साथ अच्छी प्रकार रक्षा किया जाता है, वैसे मूढ़ दुराचारी मनुष्यों द्वारा तिरस्कार किये हुए विद्याप्रचार करनेवाले मनुष्यों को समस्त पीड़ाओं से अलगकर, सत्कार के साथ सङ्ग कर, ये सेवा को प्राप्त किये जाते हैं और जो उनके बिजुली की विद्या के प्रचार के काम हैं, वे अजर-अमर हैं, यह जानना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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