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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 3

191 Sukta
25 Mantra
1/117/3
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऋषिं॑ नरा॒वंह॑स॒: पाञ्च॑जन्यमृ॒बीसा॒दत्रिं॑ मुञ्चथो ग॒णेन॑। मि॒नन्ता॒ दस्यो॒रशि॑वस्य मा॒या अ॑नुपू॒र्वं वृ॑षणा चो॒दय॑न्ता ॥

ऋषि॑म् । न॒रौ॒ । अंह॑सः । पाञ्च॑ऽजन्यम् । ऋ॒बीसा॑त् । अत्रि॑म् । मु॒ञ्च॒थः॒ । ग॒णेन॑ । मि॒नन्ता॑ । दस्योः॑ । अशि॑वस्य । मा॒याः । अ॒नु॒ऽपू॒र्वम् । वृ॒ष॒णा॒ । चो॒दय॑न्ता ॥

Mantra without Swara
ऋषिं नरावंहस: पाञ्चजन्यमृबीसादत्रिं मुञ्चथो गणेन। मिनन्ता दस्योरशिवस्य माया अनुपूर्वं वृषणा चोदयन्ता ॥

ऋषिम्। नरौ। अंहसः। पाञ्चऽजन्यम्। ऋबीसात्। अत्रिम्। मुञ्चथः। गणेन। मिनन्ता। दस्योः। अशिवस्य। मायाः। अनुऽपूर्वम्। वृषणा। चोदयन्ता ॥ १.११७.३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 13 Mantra » 3

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Meaning
हे (नरौ) विद्या प्राप्ति कराने (वृषणा) सुख के वर्षाने (चोदयन्ता) और विद्या आदि शुभ गुणों में प्रेरणा करनेवाले तथा (अशिवस्य) सबको दुःख देनेहारे (दस्योः) उचक्के की (मायाः) कपट क्रियाओं को (मिनन्ता) काटनेवाले सभासेनाधीशो ! तुम दोनों (अनुपूर्वम्) अनुकूल वेद में कहे और उत्तम विद्वानों में माने हुए सिद्धान्त जिसके, उस (पाञ्चजन्यम्) प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान में सिद्ध हुई योगसिद्धि को और जिसके सम्बन्ध में (अत्रिम्) आत्मा, मन और शरीर के दुःख नष्ट हो जाते हैं, उस (गणेन) पढ़ने-पढ़ानेवालों के साथ वर्त्तमान (ऋषिम्) वेदपारगन्ता अध्यापक को, (ऋबीसात्) नष्ट हुआ है विद्या का प्रकाश जिससे उस अविद्यारूप अन्धकार (अंहसः) और विद्या पढ़ाने को रोक देने रूप अत्यन्त पाप से (मुञ्चथः) अलग रखते हो ॥ ३ ॥
Essence
राजपुरुषों का यह अत्यन्त उत्तम काम है जो विद्याप्रचार करनेहारों को दुःख से बचाना, उनको सुख में राखना और डाकू उचक्के आदि दुष्ट जनों को दूर करना और वे राजपुरुष आप विद्या और धर्मयुक्त हो विद्वानों को विद्या और धर्म्म के प्रचार में लगाकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि करें ॥ ३ ॥
Subject
अब पढ़ने और पढ़ाने रूप राजधर्म का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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