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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 25

191 Sukta
25 Mantra
1/117/25
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
ए॒तानि॑ वामश्विना वी॒र्या॑णि॒ प्र पू॒र्व्याण्या॒यवो॑ऽवोचन्। ब्रह्म॑ कृ॒ण्वन्तो॑ वृषणा यु॒वभ्यां॑ सु॒वीरा॑सो वि॒दथ॒मा व॑देम ॥

ए॒तानि॑ । वा॒म् । अ॒श्वि॒ना॒ । वी॒र्या॑णि । प्र । पू॒र्व्याणि॑ । आ॒यवः॑ । अ॒वो॒च॒न् । ब्रह्म॑ । कृ॒ण्वन्तः॑ । वृ॒ष॒णा॒ । यु॒वऽभ्या॑म् । सु॒ऽवीरा॑सः । वि॒दथ॑म् । आ । व॒दे॒म॒ ॥

Mantra without Swara
एतानि वामश्विना वीर्याणि प्र पूर्व्याण्यायवोऽवोचन्। ब्रह्म कृण्वन्तो वृषणा युवभ्यां सुवीरासो विदथमा वदेम ॥

एतानि। वाम्। अश्विना। वीर्याणि। प्र। पूर्व्याणि। आयवः। अवोचन्। ब्रह्म। कृण्वन्तः। वृषणा। युवऽभ्याम्। सुऽवीरासः। विदथम्। आ। वदेम ॥ १.११७.२५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषणा) विद्या के वर्षाने और (अश्विनौ) प्रशंसित कर्मों में व्याप्त स्त्रीपुरुषो ! (वाम्) तुम दोनों के जो (एतानि) ये प्रशंसित (पूर्व्याणि) अगले विद्वानों ने नियत किये हुए (वीर्याणि) पराक्रमयुक्त काम हैं उनको (आयवः) मनुष्य (प्रावोचन्) भली-भाँति कहें, (युवभ्याम्) तरुण अवस्थावाले तुम दोनों के लिये (ब्रह्म) अन्न और धन को (कृण्वन्तः) सिद्ध करते हुए (सुवीरासः) जिनके अच्छी सिखावट और उत्तम विद्यायुक्त वीर पुत्र, पौत्र और सेवक हैं, वे हम लोग (विदथम्) विज्ञान करानेवाले पढ़ने-पढ़ाने रूप यज्ञ का (आ, वदेम) उपदेश करें ॥ २५ ॥
Essence
मनुष्य जिन विद्वानों ने लोक के उपकारक विद्या और धर्मोपदेश से प्रचार करनेवाले काम किये वा जिनसे किये जाते हैं, उनकी प्रशंसा और अन्न वा धन आदि से सेवा करें क्योंकि कोई विद्वानों के सङ्ग के विना विद्या आदि उत्तम-उत्तम रत्नों को नहीं पा सकते। न कोई कपट आदि दोषों से रहित शास्त्र जाननेवाले विद्वानों के सङ्ग और उनसे विद्या पढ़ने के विना अच्छी शीलता और विद्या की वृद्धि करने को समर्थ होते हैं ॥ २५ ॥इस सूक्त में राजा, प्रजा और पढ़ने-पढ़ाने आदि कामों के वर्णन से पूर्व सूक्तार्थ के साथ इस सूक्त के अर्थ की सङ्गति है, यह समझना चाहिये ॥यह १ अष्टक के ८ वे अध्याय में सत्रहवाँ वर्ग और एक सौ सत्रहवाँ सूक्त पूरा हुआ ॥
Subject
फिर स्त्री-पुरुष कब विवाह करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।