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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 24

191 Sukta
25 Mantra
1/117/24
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हिर॑ण्यहस्तमश्विना॒ ररा॑णा पु॒त्रं न॑रा वध्रिम॒त्या अ॑दत्तम्। त्रिधा॑ ह॒ श्याव॑मश्विना॒ विक॑स्त॒मुज्जी॒वस॑ ऐरयतं सुदानू ॥

हिर॑ण्यऽहस्तम् । च॒श्वि॒ना॒ । ररा॑णा । पु॒त्रम् । न॒रा॒ । व॒ध्रि॒ऽम॒त्याः । अ॒द॒त्त॒म् । त्रिधा॑ । ह॒ । श्याव॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । विऽक॑स्तम् । उत् । जी॒वसे॑ । ऐ॒र॒य॒त॒म् । सु॒दा॒नू॒ इति॑ सुऽदानू ॥

Mantra without Swara
हिरण्यहस्तमश्विना रराणा पुत्रं नरा वध्रिमत्या अदत्तम्। त्रिधा ह श्यावमश्विना विकस्तमुज्जीवस ऐरयतं सुदानू ॥

हिरण्यऽहस्तम्। अश्विना। रराणा। पुत्रम्। नरा। वध्रिऽमत्याः। अदत्तम्। त्रिधा। ह। श्यावम्। अश्विना। विऽकस्तम्। उत्। जीवसे। ऐरयतम्। सुदानू इति सुऽदानू ॥ १.११७.२४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (रराणा) उत्तम गुणों के देने (नरा) श्रेष्ठ पदार्थों की प्राप्ति कराने और (अश्विना) रक्षा आदि कर्मों में व्याप्त होनेवाले अध्यापको ! तुम दोनों (हिरण्यहस्तम्) जिसके हाथ में सुवर्ण आदि धन वा हाथ के समान, विद्या और तेज आदि पदार्थ हैं उस (वध्रिमत्याः) वृद्धि देनेवाली विद्या की (पुत्रम्) रक्षा करनेवाले जन को मेरे लिये (अदत्तम्) देओ। हे (सुदानू) अच्छे दानशील सज्जनों के समान वर्त्तमान (अश्विना) ऐश्वर्य्ययुक्त पढ़ानेवालो ! तुम दोनों उस (श्यावम्) विद्या पाये हुए (विकस्तम्) अनेकों प्रकार शिक्षा देनेहारे मनुष्य को (जीवसे) जीवन के लिये (ह) ही (त्रिधा) तीन प्रकार अर्थात् मन, वाणी और शरीर की शिक्षा आदि के साथ (उद्, ऐरयतम्) प्रेरणा देओ अर्थात् समझाओ ॥ २४ ॥
Essence
पढ़ानेवाले सज्जन पुत्रों और पढ़ानेवाली स्त्रियाँ पुत्रियों को ब्रह्मचर्य्य नियम में लगाकर, इनके दूसरे विद्याजन्म को सिद्धकर, जीवन के उपाय अच्छे प्रकार सिखाय के, समय पर उनके माता-पिता को देवें और वे घर को पाकर भी उन गुरुजनों की शिक्षाओं को न भूलें ॥ २४ ॥
Subject
अब अध्यापक का कृत्य अगले मन्त्र में कहते हैं ।