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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 22

191 Sukta
25 Mantra
1/117/22
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ॒थ॒र्व॒णाया॑श्विना दधी॒चेऽश्व्यं॒ शिर॒: प्रत्यै॑रयतम्। स वां॒ मधु॒ प्र वो॑चदृता॒यन्त्वा॒ष्ट्रं यद्द॑स्रावपिक॒क्ष्यं॑ वाम् ॥

आ॒थ॒र्व॑णाय । अ॒श्वि॒ना॒ । द॒धी॒चे । अश्व्य॑म् । शिरः॑ । प्रति॑ । ऐ॒र॒य॒त॒म् । सः । वा॒म् । मधु॑ । प्र । वो॒च॒त् । ऋ॒त॒ऽयन् । त्वा॒ष्ट्रम् । यत् । द॒स्रौ॒ । अ॒पि॒ऽक॒क्ष्य॑म् । वा॒म् ॥

Mantra without Swara
आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिर: प्रत्यैरयतम्। स वां मधु प्र वोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपिकक्ष्यं वाम् ॥

आथर्वणाय। अश्विना। दधीचे। अश्व्यम्। शिरः। प्रति। ऐरयतम्। सः। वाम्। मधु। प्र। वोचत्। ऋतऽयन्। त्वाष्ट्रम्। यत्। दस्रौ। अपिऽकक्ष्यम्। वाम् ॥ १.११७.२२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रौ) दुःख की निवृत्ति करने और (अश्विना) अच्छे कामों में प्रवृत्त करानेहारे सभासेनाधीशो ! (वाम्) तुम दोनों (यत्) जिस (आथर्वणाय) जिसके संशय कट गए उसके पुत्र के लिये तथा (दधीचे) विद्या और धर्मों को धारण किये हुए मनुष्यों की प्रशंसा करनेवाले के लिये (अश्व्यम्) घोड़ों में हुए (शिरः) उत्तम अङ्ग को (प्रत्यैरयतम्) प्राप्त करो (सः) वह (ऋतायन्) अपने को सत्य व्यवहार चाहता हुआ (वाम्) तुम दोनों के लिये (अपिकक्ष्यम्) विद्या की कक्षाओं में हुए बोधों के प्रति जो वर्त्तमान उस (त्वाष्ट्रम्) शीघ्र समस्त विद्याओं में व्याप्त होनेवाले विद्वान् के (मधु) मधुर विज्ञान का (प्र, वोचत्) उपदेश करे ॥ २२ ॥
Essence
सभासेनाधीश आदि राजजन विद्वानों में श्रद्धा करें और अच्छे कामों में प्रेरणा दें और वे तुम लोगों के लिये सत्य का उपदेश देकर प्रमाद और अधर्म से निवृत्त करें ॥ २२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।