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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 21

191 Sukta
25 Mantra
1/117/21
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यवं॒ वृके॑णाश्विना॒ वप॒न्तेषं॑ दु॒हन्ता॒ मनु॑षाय दस्रा। अ॒भि दस्युं॒ बकु॑रेणा॒ धम॑न्तो॒रु ज्योति॑श्चक्रथु॒रार्या॑य ॥

यव॑म् । वृके॑ण । अ॒श्वि॒न॒ । वप॑न्ता । इष॑म् । दु॒हन्ता॑ । मनु॑षाय । द॒स्रा॒ । अ॒भि । दस्यु॑म् । बकु॑रेण । धम॑न्ता । उ॒रु । ज्योतिः॑ । च॒क्र॒थुः॒ । आर्या॑य ॥

Mantra without Swara
यवं वृकेणाश्विना वपन्तेषं दुहन्ता मनुषाय दस्रा। अभि दस्युं बकुरेणा धमन्तोरु ज्योतिश्चक्रथुरार्याय ॥

यवम्। वृकेण। अश्विना। वपन्ता। इषम्। दुहन्ता। मनुषाय। दस्रा। अभि। दस्युम्। बकुरेण। धमन्ता। उरु। ज्योतिः। चक्रथुः। आर्याय ॥ १.११७.२१

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रा) दुःख दूर करनेहारे (अश्विना) सुख में रमे हुए सभासेनाधीशो ! तुम दोनों (मनुषाय) विचारवान् मनुष्य के लिये (वृकेण) छिन्न-भिन्न करनेवाले हल आदि शस्त्र-अस्त्र से (यवम्) यव आदि अन्न के समान (वपन्ता) बोते और (इषम्) अन्न को (दुहन्ता) पूर्ण करते हुए तथा (आर्य्याय) ईश्वर के पुत्र के तुल्य वर्त्तमान धार्मिक मनुष्य के लिये (बकुरेण) प्रकाशमान सूर्य्य ने किया (ज्योतिः) प्रकाश जैसे अन्धकार को वैसे (दस्युम्) डाकू, दुष्ट प्राणी को (अभि, धमन्ता) अग्नि से जलाते हुए (उरु) अत्यन्त बड़े राज्य को (चक्रथुः) करो ॥ २१ ॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि प्रजाजनों में जो कण्टक, लम्पट, चोर, झूठा और खारे बोलनेवाले दुष्ट मनुष्य हैं उनको रोक, खेती आदि कामों से युक्त वैश्य प्रजाजनों की रक्षा और खेती आदि कामों की उन्नति कर अत्यन्त विस्तीर्ण राज्य का सेवन करें ॥ २१ ॥
Subject
फिर राजधर्म विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।