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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 20

191 Sukta
25 Mantra
1/117/20
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अधे॑नुं दस्रा स्त॒र्यं१॒॑ विष॑क्ता॒मपि॑न्वतं श॒यवे॑ अश्विना॒ गाम्। यु॒वं शची॑भिर्विम॒दाय॑ जा॒यां न्यू॑हथुः पुरुमि॒त्रस्य॒ योषा॑म् ॥

अधे॑नुम् । द॒स्रा । स्त॒र्य॑म् । विऽस॑क्ताम् । अपि॑न्वतम् । श॒यवे॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । गाम् । यु॒वम् । शची॑भिः । वि॒ऽम॒दाय॑ । जा॒याम् । नि । ऊ॒ह॒थुः॒ । पु॒रु॒ऽमि॒त्रस्य॑ । योषा॑म् ॥

Mantra without Swara
अधेनुं दस्रा स्तर्यं१ विषक्तामपिन्वतं शयवे अश्विना गाम्। युवं शचीभिर्विमदाय जायां न्यूहथुः पुरुमित्रस्य योषाम् ॥

अधेनुम्। दस्रा। स्तर्यम्। विऽसक्ताम्। अपिन्वतम्। शयवे। अश्विना। गाम्। युवम्। शचीभिः। विऽमदाय। जायाम्। नि। ऊहथुः। पुरुऽमित्रस्य। योषाम् ॥ १.११७.२०

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (दस्रा) दुःख दूर करनेहारे (अश्विना) भूगर्भ विद्या को जानते हुए स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (शचीभिः) कर्मों के साथ (विषक्ताम्) विविध प्रकार के पदार्थों से युक्त (स्तर्य्यम्) सुखों से ढाँपनेवाली नाव वा (अधेनुम्) नहीं दुहानेहारी (गाम्) गौ को (अपिन्वतम्) जलों से सींचो (विमदाय) विशेष मदयुक्त अर्थात् पूर्ण युवावस्थावाले (शयवे) सोते हुए पुरुष के लिये (पुरुमित्रस्य) बहुत मित्रवाले की (योषाम्) युवति कन्या को (जायाम्) पत्नीपन को (न्यूहथुः) निरन्तर प्राप्त कराओ ॥ २० ॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो ! तुम जैसे सबके मित्र की सुलक्षणा मन लगती, ब्रह्मचारिणी, पण्डिता, अच्छे शीलस्वभाव की, निरन्तर सुख देनेवाली, धर्मशील, कुमारी को भार्य्या करने के लिये स्वीकार कर उसकी रक्षा करते हो, वैसे ही साम, दाम, दण्ड, भेद अर्थात् शान्ति, किसी प्रकार का दबाव, दण्ड देना ओर एक से दूसरे को तोड़-फोड़ उसको बेमन करना आदि राज कामों से भूमि के राज्य को पाकर धर्म से सदैव उसकी रक्षा करो ॥ २० ॥
Subject
अब स्त्रीपुरुष विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।