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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 17

191 Sukta
25 Mantra
1/117/17
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
श॒तं मे॒षान्वृ॒क्ये॑ मामहा॒नं तम॒: प्रणी॑त॒मशि॑वेन पि॒त्रा। आक्षी ऋ॒ज्राश्वे॑ अश्विनावधत्तं॒ ज्योति॑र॒न्धाय॑ चक्रथुर्वि॒चक्षे॑ ॥

श॒तम् । मे॒षान् । वृ॒क्ये॑ । म॒म॒हा॒नम् । तमः॑ । प्रऽणी॑तम् । अशि॑वेन । पि॒त्रा । आ । अ॒क्षी इति॑ । ऋ॒ज्रऽअ॑श्वे । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒ध॒त्त॒म् । ज्योतिः॑ । अ॒न्धाय॑ । च॒क्र॒थुः॒ । वि॒ऽचक्षे॑ ॥

Mantra without Swara
शतं मेषान्वृक्ये मामहानं तम: प्रणीतमशिवेन पित्रा। आक्षी ऋज्राश्वे अश्विनावधत्तं ज्योतिरन्धाय चक्रथुर्विचक्षे ॥

शतम्। मेषान्। वृक्ये। ममहानम्। तमः। प्रऽणीतम्। अशिवेन। पित्रा। आ। अक्षी इति। ऋज्रऽअश्वे। अश्विनौ। अधत्तम्। ज्योतिः। अन्धाय। चक्रथुः। विऽचक्षे ॥ १.११७.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विनौ) सभा सेनाधीशो ! तुम दोनों जिस (अशिवेन) अमङ्गलकारी (पित्रा) प्रजा पालनेहारे न्यायाधीश ने (तमः) दुःखरूप अन्धकार (प्रणीतम्) भली-भाँति पहुँचाया उस (वृक्ये) भेड़िनी के लिये (शतम्) सैकड़ों (मेषान्) मेढ़ों को (मामहानम्) देते हुए के समान प्रजाजनों को पीड़ा देते हुए राज्याधिकारी को छुड़ाओ, अलग करो (ऋज्राश्वे) अच्छे सीखे हुए घोड़े आदि पदार्थों से युक्त सेना में (अक्षी) आँखों का (आ, अधत्तम्) आधान करो अर्थात् दृष्टि देओ, वहाँ के बने-बिगड़े व्यवहार को विचारो और (अन्धाय) अन्धे के समान अज्ञानी के लिये (विचक्षे) विज्ञानपूर्वक देखने के लिये (ज्योतिः) विद्याप्रकाश को (चक्रथुः) प्रकाशित करो ॥ १७ ॥
Essence
हे सभासेना आदि के पुरुषो ! तुम लोग प्रजाजनों में अन्याय से भेड़िनी अपने प्रयोजन के लिये भेड़ बकरों में जैसे प्रवृत्त होते हैं, वैसे वर्त्ताव रखनेवाले अपने भृत्यों को अच्छे दण्ड देकर अन्य धर्मात्मा भृत्यों से प्रजाजनों में सूर्य्य के समान रक्षा आदि व्यवहारों को निरन्तर प्रकाशित करो। जैसे आँखवाला कुएँ से अन्धे को बचाकर सुख देता है, वैसे अन्याय करनेवाले भृत्यों से पीड़ा को प्राप्त हुए प्रजाजनों को अलग रक्खो ॥ १७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।