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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 16

191 Sukta
25 Mantra
1/117/16
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अजो॑हवीदश्विना॒ वर्ति॑का वामा॒स्नो यत्सी॒ममु॑ञ्चतं॒ वृक॑स्य। वि ज॒युषा॑ ययथु॒: सान्वद्रे॑र्जा॒तं वि॒ष्वाचो॑ अहतं वि॒षेण॑ ॥

अजो॑हवीत् । अ॒श्वि॒ना॒ । वर्ति॑का । वा॒म् । आ॒स्नः । यत् । सी॒म् । अमु॑ञ्चतम् । वृक॑स्य । वि । ज॒युषा॑ । य॒य॒थुः॒ । सानु॑ । अद्रेः॑ । जा॒तम् । वि॒ष्वाचः॑ । अ॒ह॒त॒म् । वि॒षेण॑ ॥

Mantra without Swara
अजोहवीदश्विना वर्तिका वामास्नो यत्सीममुञ्चतं वृकस्य। वि जयुषा ययथु: सान्वद्रेर्जातं विष्वाचो अहतं विषेण ॥

अजोहवीत्। अश्विना। वर्तिका। वाम्। आस्नः। यत्। सीम्। अमुञ्चतम्। वृकस्य। वि। जयुषा। ययथुः। सानु। अद्रेः। जातम्। विष्वाचः। अहतम्। विषेण ॥ १.११७.१६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 16 Mantra » 1

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Meaning
हे (अश्विना) शीघ्र जानेहारे सभासेनाधीशो ! (वर्त्तिका) संग्राम में वर्त्तमान सेना (यत्सीम्) जिसी समय (वाम्) तुम दोनों को (अजोहवीत्) निरन्तर बुलावे तब उसको (वृकस्य) भेड़िया के (आस्नः) मुख से जैसे वैसे शत्रुमण्डल से (अमुञ्चतम्) छुड़ावो अर्थात् उसको जीतो और अपनी सेना को बचाओ, तुम दोनों (जयुषा) जय देनेवाले अपने रथ से (अद्रेः) पर्वत के (सानु) शिखर को (वि, ययथुः) विविध प्रकार जाओ और (विष्वाचः) विविध गतिवाले शत्रुमण्डल के (जातम्) उत्पन्न हुए बल को (विषेण) उसका विपर्य्यय करनेवाले विषरूप अपने बल से (अहतम्) विनाशो नष्ट करो ॥ १६ ॥
Essence
राजपुरुष जैसे बलवान् दयालु शूरवीर बघेले के मुख से छेरी को छुड़ाता है, वैसे डाकुओं के भय से प्रजाजनों को अलग रक्खें। जब शत्रुजन पर्वतों में वर्त्तमान मारे नहीं जा सकते हों तब उनके अन्न-पान आदि को विदूषित कर उनको वश में लावें ॥ १६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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