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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 15

191 Sukta
25 Mantra
1/117/15
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अजो॑हवीदश्विना तौ॒ग्र्यो वां॒ प्रोळ्ह॑: समु॒द्रम॑व्य॒थिर्ज॑ग॒न्वान्। निष्टमू॑हथुः सु॒युजा॒ रथे॑न॒ मनो॑जवसा वृषणा स्व॒स्ति ॥

अजो॑हवीत् । अ॒श्वि॒ना॒ । तौ॒ग्र्यः । वा॒म् । प्रऽऊ॑ळ्हः । स॒मु॒द्रम् । अ॒व्य॒थिः । ज॒ग॒न्वान् । निः । तम् । ऊ॒ह॒थुः॒ । सु॒ऽयुजा॑ । रथे॑न । मनः॑ऽजवसा । वृ॒ष॒णा॒ । स्व॒स्ति ॥

Mantra without Swara
अजोहवीदश्विना तौग्र्यो वां प्रोळ्ह: समुद्रमव्यथिर्जगन्वान्। निष्टमूहथुः सुयुजा रथेन मनोजवसा वृषणा स्वस्ति ॥

अजोहवीत्। अश्विना। तौग्र्यः। वाम्। प्रऽऊळ्हः। समुद्रम्। अव्यथिः। जगन्वान्। निः। तम्। ऊहथुः। सुऽयुजा। रथेन। मनःऽजवसा। वृषणा। स्वस्ति ॥ १.११७.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषणा) उत्तम बलवाले (अश्विना) विद्या और उत्तम शीलों में व्याप्त स्त्री-पुरुषो ! तुम दोनों जो (वाम्) तुम्हारा (तौग्र्यः) बल से सिद्ध हुआ (प्रोढः) उत्तमता से प्राप्त (अव्यथिः) जिसको व्यथा कष्ट नहीं है (जगन्वान्) जो निरन्तर गमन करनेवाला सेना का समुदाय है वह (समुद्रम्) समुद्र का (अजोहवीत्) बार-बार तिरस्कार करे अर्थात् उससे उत्तीर्ण हो उसकी गम्भीरता न गिने, (तम्) उस उक्त सेना समुदाय को (सुयुजा) सुन्दरता से जुड़े (मनोजवसा) मन के समान वेग से जाते हुए (रथेन) रमणीय विमान आदि यानसमुदाय से (स्वस्ति) सुखपूर्वक (निरूहथुः) निर्वाहो अर्थात् एक देश से दूसरे देश को पहुँचाओ ॥ १५ ॥
Essence
जब ब्रह्मचर्य किये पुरुष शत्रुओं के विजय के लिये समुद्र के पार जाना चाहें तब स्त्री और सेना के साथ ही वेगवान् यानों से जावें-आवें ॥ १५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।