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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 14

191 Sukta
25 Mantra
1/117/14
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वं तुग्रा॑य पू॒र्व्येभि॒रेवै॑: पुनर्म॒न्याव॑भवतं युवाना। यु॒वं भु॒ज्युमर्ण॑सो॒ निः स॑मु॒द्राद्विभि॑रूहथुरृ॒ज्रेभि॒रश्वै॑: ॥

यु॒वम् । तुग्रा॑य । पू॒र्व्येभिः॑ । एवैः॑ । पु॒नः॒ऽम॒न्यौ । अ॒भ॒व॒त॒म् । यु॒वा॒ना॒ । यु॒वम् । भु॒ज्युम् । अर्ण॑सः । निः । स॒मु॒द्रात् । विऽभिः॑ । ऊ॒ह॒थुः॒ । ऋ॒ज्रेभिः॑ । अश्वैः॑ ॥

Mantra without Swara
युवं तुग्राय पूर्व्येभिरेवै: पुनर्मन्यावभवतं युवाना। युवं भुज्युमर्णसो निः समुद्राद्विभिरूहथुरृज्रेभिरश्वै: ॥

युवम्। तुग्राय। पूर्व्येभिः। एवैः। पुनःऽमन्यौ। अभवतम्। युवाना। युवम्। भुज्युम्। अर्णसः। निः। समुद्रात्। विऽभिः। ऊहथुः। ऋज्रेभिः। अश्वैः ॥ १.११७.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (पुनर्मन्यौ) बार-बार जाननेवाले (युवाना) युवावस्था को प्राप्त विद्या पढ़े हुए स्त्री-पुरुषो ! (युवम्) तुम दोनों (तुग्राय) बल के लिये (पूर्व्येभिः) अगले सज्जनों से किये हुए (एवैः) विज्ञान आदि उत्तम व्यवहारों से सुखी (अभवतम्) होओ, (युवम्) तुम दोनों (विभिः) आकाश में उड़नेवाले पक्षियों के समान (ऋज्रेभिः) जिनसे हाल न लगे उन जोड़े हुए सरल चाल से चलाने और (अश्वैः) शीघ्र जानेवाले बिजुली आदि पदार्थों से बने हुए विमानादि यानों से (अर्णसः) अगाध जल से भरे हुए (समुद्रात्) समुद्र से पार (भुज्युम्) शरीर और आत्मा की पालना करनेवाले पदार्थों को (निरूहथुः) निर्वाहो अर्थात् निरन्तर पहुँचाओ ॥ १४ ॥
Essence
स्त्री-पुरुष अगले महात्मा, ऋषि, महर्षियों ने किये जो काम हैं, उनका आचरण कर धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से शीघ्र पूर्ण विद्याओं को पाकर क्रिया की कुशलता से विमान आदि यानों को बनाकर भूगोल के सब ओर विहार कर नित्य आनन्दयुक्त हों ॥ १४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।