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Rigveda Mandal 1 / Sukta 117 / Mantra 12

191 Sukta
25 Mantra
1/117/12
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
कुह॒ यान्ता॑ सुष्टु॒तिं का॒व्यस्य॒ दिवो॑ नपाता वृषणा शयु॒त्रा। हिर॑ण्यस्येव क॒लशं॒ निखा॑त॒मुदू॑पथुर्दश॒मे अ॑श्वि॒नाह॑न् ॥

कुह॑ । यान्ता॑ । सु॒ऽस्तु॒तिम् । का॒व्यस्य॑ । दिवः॑ । न॒पा॒ता॒ । वृ॒ष॒णा॒ । श॒यु॒ऽत्रा । हिर॑ण्यस्यऽइव । क॒लश॑म् । निऽखा॑तम् । उत् । ऊ॒प॒थुः॒ । द॒श॒मे । अ॒श्वि॒ना॒ । अह॑न् ॥

Mantra without Swara
कुह यान्ता सुष्टुतिं काव्यस्य दिवो नपाता वृषणा शयुत्रा। हिरण्यस्येव कलशं निखातमुदूपथुर्दशमे अश्विनाहन् ॥

कुह। यान्ता। सुऽस्तुतिम्। काव्यस्य। दिवः। नपाता। वृषणा। शयुऽत्रा। हिरण्यस्यऽइव। कलशम्। निऽखातम्। उत्। ऊपथुः। दशमे। अश्विना। अहन् ॥ १.११७.१२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 15 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (यान्ता) गमन करने (नपाता) न गिरने (वृषणा) श्रेष्ठ कामनाओं की वर्षा कराने और (शयुत्रा) सोते हुए प्राणियों की रक्षा करनेवाले (अश्विना) सभा सेनाधीशो ! तुम दोनों (दशमे) दशवें (अहन्) दिन (हिरण्यस्येव) सुवर्ण के (निखातम्) बीच में पोले (कलशम्) घड़ा के समान (दिवः) विज्ञानयुक्त (काव्यस्य) कविताई की (सुष्टुतिम्) अच्छी बढ़ाई को (कुह) कहाँ (उदूपथुः) उत्कर्ष से बोते हो ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे धनाढ्यजन सुवर्ण आदि धातुओं के वासनों में दूध, घी, दही आदि पदार्थों को धर और उनको पकाकर खाते हुए प्रशंसा पाते हैं, वैसे दो शिल्पीजन इस विद्या और न्यायमार्गों में प्रजाजनों का प्रवेश कराकर धर्म और न्याय के उपदेशों से उनको पक्के कर राज्य और धन के सुख को भोगते हुए प्रशंसित कहाँ होवें ? इसका यह उत्तर है कि धार्मिक विद्वान् जनों में होवें ॥ १२ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।