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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 9

191 Sukta
25 Mantra
1/116/9
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परा॑व॒तं ना॑सत्यानुदेथामु॒च्चाबु॑ध्नं चक्रथुर्जि॒ह्मवा॑रम्। क्षर॒न्नापो॒ न पा॒यना॑य रा॒ये स॒हस्रा॑य॒ तृष्य॑ते॒ गोत॑मस्य ॥

परा॑ । अ॒व॒तम् । ना॒स॒त्या॒ । अ॒नु॒दे॒था॒म् । उ॒च्चाऽबु॑ध्नम् । च॒क्र॒थुः॒ । जि॒ह्मऽबा॑रम् । क्षर॑न् । आपः॑ । न । पा॒यना॑य । रा॒ये । स॒हस्रा॑य । तृष्य॑ते । गोत॑मस्य ॥

Mantra without Swara
परावतं नासत्यानुदेथामुच्चाबुध्नं चक्रथुर्जिह्मवारम्। क्षरन्नापो न पायनाय राये सहस्राय तृष्यते गोतमस्य ॥

परा। अवतम्। नासत्या। अनुदेथाम्। उच्चाऽबुध्नम्। चक्रथुः। जिह्मऽवारम्। क्षरन्। आपः। न। पायनाय। राये। सहस्राय। तृष्यते। गोतमस्य ॥ १.११६.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 4

Bhashya

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Meaning
हे (नासत्या) आग और पवन के समान वर्त्तमान सभापति और सेनाधिपति ! तुम दोनों (जिह्मवारम्) जिसको टेढ़ी लगन और (उच्चाबुध्नम्) उससे जिसमें ऊँचा अन्तरिक्ष अर्थात् अवकाश उस रथ आदि को (अवतम्) रक्खो और अनेक कामों की सिद्धि (चक्रथुः) करो और उसको यथायोग्य व्यवहार में (परा, अनुदेथाम्) लगाओ। जो (गोतमस्य) अतीव स्तुति करनेवाले के रथ आदि पर (तृष्यते) प्यासे के लिये (पायनाय) पीने को (आपः) भाफरूप जल जैसे (क्षरन्) गिरते हैं (न) वैसे (सहस्राय) असंख्यात (राये) धन के लिये अर्थात् धन देने के लिये प्रसिद्ध होता है वैसे रथ आदि को बनाओ ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। शिल्पी लोगों को विमानादि यानों में जिसमें बहुत मीठे जल की धार मावे ऐसे कुण्ड को बना, आग से उस विमान आदि यान को चला, उसमें सामग्री को धर, एक देश से दूसरे देश को जाय और असंख्यात धन पाय के परोपकार का सेवन करना चाहिये ॥ ९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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