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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 8

191 Sukta
25 Mantra
1/116/8
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
हि॒मेना॒ग्निं घ्रं॒सम॑वारयेथां पितु॒मती॒मूर्ज॑मस्मा अधत्तम्। ऋ॒बीसे॒ अत्रि॑मश्वि॒नाव॑नीत॒मुन्नि॑न्यथु॒: सर्व॑गणं स्व॒स्ति ॥

हि॒मेन॑ । अ॒ग्निम् । घ्रं॒सम् । अ॒वा॒र॒ये॒था॒म् । पि॒तु॒ऽमती॒म् । ऊर्ज॑म् । अ॒स्मै॒ । अ॒ध॒त्त॒म् । ऋ॒बीसे॑ । अत्रि॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । अव॑ऽनीतम् । उत् । नि॒न्य॒थुः॒ । सर्व॑ऽगणम् । स्व॒स्ति ॥

Mantra without Swara
हिमेनाग्निं घ्रंसमवारयेथां पितुमतीमूर्जमस्मा अधत्तम्। ऋबीसे अत्रिमश्विनावनीतमुन्निन्यथु: सर्वगणं स्वस्ति ॥

हिमेन। अग्निम्। घ्रंसम्। अवारयेथाम्। पितुऽमतीम्। ऊर्जम्। अस्मै। अधत्तम्। ऋबीसे। अत्रिम्। अश्विना। अवऽनीतम्। उत्। निन्यथुः। सर्वऽगणम्। स्वस्ति ॥ १.११६.८

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) यज्ञानुष्ठान करनेवाले पुरुषो ! तुम दोनों (हिमेन) शीतल जल से (अग्निम्) आग और (घ्रंसम्) रात्रि के साथ दिन को (अवारयेथाम्) निर्वारो अर्थात् बिताओ। (अस्मै) इसके लिये (पितुमतीम्) प्रशंसित अन्नयुक्त (ऊर्जम्) बलरूपी नीति को (अधत्तम्) पुष्ट करो और (ऋबीसे) दुःख से जिसकी आभा जाती रही उस व्यवहार में (अत्रिम्) भोगनेहारे (अवनीतम्) पीछे प्राप्त कराये हुए (सर्वगणम्) जिसमें समस्त उत्तम पदार्थों का समूह है, उस (स्वस्ति) सुख को (उन्निन्यथुः) उन्नति देओ ॥ ८ ॥
Essence
विद्वानों को चाहिये कि इस संसार के सुख के लिये यज्ञ से शोधे हुए जल से और वनों के रखने से अति उष्णता (खुश्की) दूर करें। अच्छे बनाए हुए अन्न से बल उत्पन्न करें और यज्ञ के आचरण से तीन प्रकार के दुःख को निवार के सुख को उन्नति देवें ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।