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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 6

191 Sukta
25 Mantra
1/116/6
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यम॑श्विना द॒दथु॑: श्वे॒तमश्व॑म॒घाश्वा॑य॒ शश्व॒दित्स्व॒स्ति। तद्वां॑ दा॒त्रं महि॑ की॒र्तेन्यं॑ भूत्पै॒द्वो वा॒जी सद॒मिद्धव्यो॑ अ॒र्यः ॥

यम् । अ॒श्वि॒ना॒ । द॒दथुः॑ । श्वे॒तम् । अश्व॑म् । अ॒घऽअ॑श्वाय । शश्व॑त् । इत् । स्व॒स्ति । तत् । वा॒म् । दा॒त्रम् । महि॑ । की॒र्तेन्य॑म् । भू॒त् । पै॒द्वः । वा॒जी । सद॑म् । इत् । हव्यः॑ । अ॒र्यः ॥

Mantra without Swara
यमश्विना ददथु: श्वेतमश्वमघाश्वाय शश्वदित्स्वस्ति। तद्वां दात्रं महि कीर्तेन्यं भूत्पैद्वो वाजी सदमिद्धव्यो अर्यः ॥

यम्। अश्विना। ददथुः। श्वेतम्। अश्वम्। अघऽअश्वाय। शश्वत्। इत्। स्वस्ति। तत्। वाम्। दात्रम्। महि। कीर्तेन्यम्। भूत्। पैद्वः। वाजी। सदम्। इत्। हव्यः। अर्यः ॥ १.११६.६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 9 Mantra » 1

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Meaning
हे (अश्विना) जल और पृथिवी के समान शीघ्र सुख के देनेहारो सभासेनापति ! तुम दोनों (अघाश्वाय) जो मारने के न योग्य और शीघ्र पहुँचानेवाला है उस वैश्य के लिये (यम्) जिस (श्वेतम्) अच्छे बढ़े हुए (अश्वम्) मार्ग में व्याप्त प्रकाशमान बिजुलीरूप अग्नि को (ददथुः) देते हो तथा जिससे (शश्वत्) निरन्तर (स्वस्ति) सुख को पाकर (वाम्) तुम दोनों की (कीर्त्तेन्यम्) कीर्त्ति होने के लिये (महि) बड़े राज्यपद (दात्रम्) और देने योग्य (इत्) ही पदार्थ को ग्रहण कर (पैद्वः) सुख से ले जानेहारा (वाजी) अच्छा ज्ञानवान् पुरुष उस (सदम्) रथ को कि जिसमें बैठते हैं रच के (अर्यः) वणियाँ (हव्यः) पदार्थों के लेने योग्य (भूत्) होता है (तत्, इत्) उसी पूर्वोक्त विमानादि को बनाओ ॥ ६ ॥
Essence
जो सभा और सेना के अधिपति वणियों (=वणिकों) की भली-भाँति रक्षा कर रथ आदि यानों में बैठाकर द्वीप-द्वीपान्तर में पहुँचावें, वे बहुत धनयुक्त होकर निरन्तर सुखी होते हैं ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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