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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 5

191 Sukta
25 Mantra
1/116/5
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒ना॒र॒म्भ॒णे तद॑वीरयेथामनास्था॒ने अ॑ग्रभ॒णे स॑मु॒द्रे। यद॑श्विना ऊ॒हथु॑र्भु॒ज्युमस्तं॑ श॒तारि॑त्रां॒ नाव॑मातस्थि॒वांस॑म् ॥

अ॒ना॒र॒म्भ॒णे । तत् । अ॒वी॒र॒ये॒था॒म् । अ॒ना॒स्था॒ने । अ॒ग्र॒भ॒णे । स॒मु॒द्रे । यत् । अ॒श्वि॒ना॒ । ऊ॒हथुः॑ । भु॒ज्युम् । अस्त॑म् । श॒तऽअ॑रित्रान् । नाव॑म् । आ॒त॒स्थि॒वांस॑म् ॥

Mantra without Swara
अनारम्भणे तदवीरयेथामनास्थाने अग्रभणे समुद्रे। यदश्विना ऊहथुर्भुज्युमस्तं शतारित्रां नावमातस्थिवांसम् ॥

अनारम्भणे। तत्। अवीरयेथाम्। अनास्थाने। अग्रभणे। समुद्रे। यत्। अश्विना। ऊहथुः। भुज्युम्। अस्तम्। शतऽअरित्रान्। नावम्। आतस्थिवांसम् ॥ १.११६.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विनौ) विद्या में व्याप्त होनेवाले सभा सेनापति ! (यत्) तुम दोनों (अनारम्भणे) जिसमें आने-जाने का आरम्भ (अनास्थाने) ठहरने की जगह और (अग्रभणे) पकड़ नहीं है उस (समुद्रे) अन्तरिक्ष वा सागर में (शतारित्राम्) जिसमें जल की थाह लेने को सौ वल्ली वा सौ खम्भे लगे रहते और (नावम्) जिसको चलाते वा पठाते उस नाव को बिजुली और पवन के वेग के समान (ऊहथुः) बहाओ और (अस्तम्) जिसमें दुःखों को दूर करें उस घर में (आतस्थिवांसम्) धरे हुए (भुज्यम्) खाने-पीने के पदार्थ समूह को (अवीरयेथाम्) एक देश से दूसरे देश को ले जाओ, (तत्) उन तुम लोगों का हम सदा सत्कार करें ॥ ५ ॥
Essence
राजपुरुषों को चाहिये कि निरालम्ब मार्ग में अर्थात् जिसमें कुछ ठहरने का स्थान नहीं है वहां विमान आदि यानों से ही जावें। जबतक युद्ध में लड़नेवाले वीरों की जैसी चाहिये वैसी रक्षा न की जाय तबतक शत्रु जीते नहीं जा सकते, जिसमें सौ वल्ली विद्यमान हैं वह बड़े फैलाव की नाव बनाई जा सकती है। इस मन्त्र में शत शब्द असंख्यातयाची भी लिया जा सकता है, इससे अतिदीर्घ नौका का बनाना इस मन्त्र में जाना जाता है। मनुष्य जितनी बड़ी नौका बना सकते हैं, उतनी बड़ी बनानी चाहिये। इस प्रकार शीघ्र जानेवाला पुरुष भूमि और अन्तरिक्ष में जाने-आने के लिये यानों को बनावे ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।