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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 4

191 Sukta
25 Mantra
1/116/4
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ति॒स्रः क्षप॒स्त्रिरहा॑ति॒व्रज॑द्भि॒र्नास॑त्या भु॒ज्युमू॑हथुः पत॒ङ्गैः। स॒मु॒द्रस्य॒ धन्व॑न्ना॒र्द्रस्य॑ पा॒रे त्रि॒भी रथै॑: श॒तप॑द्भि॒: षळ॑श्वैः ॥

ति॒स्रः । क्षपः॑ । त्रिः । अहा॑ । अ॒ति॒व्रज॑त्ऽभिः । नास॑त्या । भु॒ज्युम् । ऊ॒ह॒थुः॒ । प॒त॒ङ्गैः । स॒मु॒द्रस्य॑ । धन्व॑न् । आ॒र्द्रस्य॑ । पा॒रे । त्रि॒ऽभिः । रथैः॑ । श॒तप॑त्ऽभिः । षट्ऽअ॑श्वैः ॥

Mantra without Swara
तिस्रः क्षपस्त्रिरहातिव्रजद्भिर्नासत्या भुज्युमूहथुः पतङ्गैः। समुद्रस्य धन्वन्नार्द्रस्य पारे त्रिभी रथै: शतपद्भि: षळश्वैः ॥

तिस्रः। क्षपः। त्रिः। अहा। अतिव्रजत्ऽभिः। नासत्या। भुज्युम्। ऊहथुः। पतङ्गैः। समुद्रस्य। धन्वन्। आर्द्रस्य। पारे। त्रिऽभिः। रथैः। शतपत्ऽभिः। षट्ऽअश्वैः ॥ १.११६.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 4

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Meaning
हे (नासत्या) सत्य से परिपूर्ण सभापति और सेनापति ! तुम दोनों (तिस्रः) तीन (क्षपः) रात्रि (अहा) तीन दिन (अतिव्रजद्भिः) अतीव चलते हुए पदार्थ (पतङ्गैः) जो कि घोड़े के समान वेगवाले हैं उनके साथ वर्त्तमान (षडश्वैः) जिनमें जल्दी ले जानेहारे छः कलों के घर विद्यमान उन (शतपद्भिः) सैकड़ों पग के समान वेगयुक्त (त्रिभिः) भूमि, अन्तरिक्ष और जल में चलनेहारे (रथैः) रमणीय सुन्दर मनोहर विमान आदि रथों से (भुज्युम्) राज्य की पालना करनेवाले को (समुद्रस्य) जिसमें अच्छे प्रकार परमाणुरूप जल जाते हैं उस अन्तरिक्ष वा (धन्वन्) जिसमें बहुत बालू है उस भूमि वा (आर्द्रस्य) कींच के सहित जो समुद्र उसके (पारे) पार में (त्रिः) तीन बार (ऊहथुः) पहुँचाओ ॥ ४ ॥
Essence
आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य जो तीन दिन-रात में समुद्र आदि स्थानों के अवार-पार जावें-आवेंगे तो कुछ भी सुख दुर्लभ रहेगा ! किन्तु कुछ भी नहीं ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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