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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 3

191 Sukta
25 Mantra
1/116/3
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तुग्रो॑ ह भु॒ज्युम॑श्विनोदमे॒घे र॒यिं न कश्चि॑न्ममृ॒वाँ अवा॑हाः। तमू॑हथुर्नौ॒भिरा॑त्म॒न्वती॑भिरन्तरिक्ष॒प्रुद्भि॒रपो॑दकाभिः ॥

तुग्रः॑ । ह॒ । भु॒ज्युम् । अ॒श्वि॒ना॒ । उ॒द॒ऽमे॒घे । र॒यिम् । न । कः । चि॒त् । म॒मृ॒ऽवाम् । अव॑ । अ॒हाः॒ । तम् । ऊ॒ह॒थुः॒ । नौ॒भिः । आ॒त्म॒न्ऽवती॑भिः । अ॒न्त॒रि॒क्ष॒प्रुत्ऽभिः॑ । अप॑ऽउदकाभिः ॥

Mantra without Swara
तुग्रो ह भुज्युमश्विनोदमेघे रयिं न कश्चिन्ममृवाँ अवाहाः। तमूहथुर्नौभिरात्मन्वतीभिरन्तरिक्षप्रुद्भिरपोदकाभिः ॥

तुग्रः। ह। भुज्युम्। अश्विना। उदऽमेघे। रयिम्। न। कः। चित्। ममृऽवाम्। अव। अहाः। तम्। ऊहथुः। नौभिः। आत्मन्ऽवतीभिः। अन्तरिक्षप्रुत्ऽभिः। अपऽउदकाभिः ॥ १.११६.३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) पवन और बिजुली के समान बलवान् सेनाधीशो ! तुम (तुग्रः) शत्रुओं के मारनेवाला सेनापति शत्रुजन के मारने के लिये जिस (भुज्युम्) राज्य की पालना करने वा सुख भोगनेहारे पुरुष को (उदमेघे) जिसके जलों से संसार सींचा जाता है, उस समुद्र में जैसे (कश्चित्) कोई (ममृवान्) मरता हुआ (रयिम्) धन को छोड़े (न) वैसे (अवाहाः) छोड़ता है (तं, ह) उसी को (अपोदकाभिः) जल जिनमें आते-जाते (अन्तरिक्षप्रुद्भिः) अवकाश में चलती हुई (आत्मन्वतीभिः) और प्रशंसायुक्त विचारवाले क्रिया करने में चतुर पुरुष जिनमें विद्यमान उन (नौभिः) नावों से (ऊहथुः) एक स्थान से दूसरे स्थान को पहुँचाओ ॥ ३ ॥
Essence
जैसे कोई मरण चाहता हुआ मनुष्य धन, पुत्र आदि के मोह से छूट के शरीर से निकल जाता है, वैसे युद्ध चाहते हुए शूरों को अनुभव करना चाहिए। जब मनुष्य पृथिवी के किसी भाग से किसी भाग को समुद्र से उतरकर शत्रुओं के जीतने को जाया चाहें तब पुष्ट बड़ी-बड़ी कि जिनमें भीतर जल न जाता हो और जिनमें आत्मज्ञानी विचारवाले पुरुष बैठे हों और जो शस्त्र-अस्त्र आदि युद्ध की सामग्री से शोभित हों, उन नावों के साथ जावें ॥ ३ ॥
Subject
अब नाव आदि के बनाने की विद्या का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।