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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 24

191 Sukta
25 Mantra
1/116/24
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
दश॒ रात्री॒रशि॑वेना॒ नव॒ द्यूनव॑नद्धं श्नथि॒तम॒प्स्व१॒॑न्तः। विप्रु॑तं रे॒भमु॒दनि॒ प्रवृ॑क्त॒मुन्नि॑न्यथु॒: सोम॑मिव स्रु॒वेण॑ ॥

दश॑ । रात्रीः॑ । अशि॑वेन । नव॑ । द्यून् । अव॑ऽनद्धम् । श्न॒थि॒तम् अ॒प्ऽसु । अ॒न्तरिति॑ । विऽप्रु॑तम् । रे॒भम् । उ॒दनि॑ । प्रऽवृ॑क्तम् । उत् । नि॒न्य॒थुः॒ । सोम॑म्ऽइव स्रु॒वेण॑ ॥

Mantra without Swara
दश रात्रीरशिवेना नव द्यूनवनद्धं श्नथितमप्स्व१न्तः। विप्रुतं रेभमुदनि प्रवृक्तमुन्निन्यथु: सोममिव स्रुवेण ॥

दश। रात्रीः। अशिवेन। नव। द्यून्। अवऽनद्धम्। श्नथितम् अप्ऽसु। अन्तरिति। विऽप्रुतम्। रेभम्। उदनि। प्रऽवृक्तम्। उत्। निन्यथुः। सोमम्ऽइव स्रुवेण ॥ १.११६.२४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 12 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) असत्य को छोड़कर सत्य का ग्रहण करने, पढ़ाने और उपदेश करनेवालो ! तुम दोनों जैसे (शचीभिः) अच्छी शिक्षा देनेवाली वाणियों से (अशिवेन) अमङ्गल करनेवाले युद्ध के साथ वर्त्तमान शिल्पी जन (अवनद्धम्) नीचे से बन्धी (श्नथितम्) ढीली किई (उदनि) जल में (विप्रुतम्) चलाई (प्रवृक्तम्) और इधर-उधर जाने से रोकी हुई नौका आदि को (दशः) दश (रात्रीः) रात्रि (नव) नौ (द्यून्) दिनों तक (अप्सु) जलों में (अन्तः) भीतर स्थिर कर फिर ऊपर को पहुँचावें, उस ढंग से ओर जैसे (स्रुवेण) घी आदि के उठाने के साधन स्रुवा से (सोममिव) सोमलतादि ओषधियों को उठाते हैं, वैसे (रेभम्) सबकी प्रशंसा करनेहारे अच्छे सज्जन को (उन्निन्यथुः) उन्नति को पहुँचाओ ॥ २४ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। पिछले मन्त्र से (नासत्या, शचीभिः) इन दो पदों की अनुवृत्ति आती है। हे मनुष्यो ! जैसे जल के भीतर नौका आदि में स्थित हुई सेना शत्रुओं से मारी नहीं जा सकती, वैसे विद्या और सत्यधर्म के उपदेशों में स्थापित किये हुए जन अविद्याजन्य दुःख से पीड़ा नहीं पाते। जैसे नियत समय पर कारीगर लोग नौकादि यानों को जल में इधर-उधर लेजा के शत्रुओं को जीतते हैं, वैसे विद्यादान से अविद्याओं को आप जीतो। जैसे यज्ञकर्म में होमा हुआ द्रव्य वायु और जल आदि की शुद्धि करनेवाला होता है, वैसे सज्जनों का उपदेश आत्मा की शुद्धि करनेवाला होता है ॥ २४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।