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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 23

191 Sukta
25 Mantra
1/116/23
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒व॒स्य॒ते स्तु॑व॒ते कृ॑ष्णि॒याय॑ ऋजूय॒ते ना॑सत्या॒ शची॑भिः। प॒शुं न न॒ष्टमि॑व॒ दर्श॑नाय विष्णा॒प्वं॑ ददथु॒र्विश्व॑काय ॥

अ॒व॒स्य॒ते । स्तु॒व॒ते । कृ॒ष्णि॒याय॑ । ऋ॒जु॒ऽय॒ते । ना॒स॒त्या॒ । शची॑भिः । प॒शुम् । न । न॒ष्टम्ऽइ॑व । दर्श॑नाय । वि॒ष्णा॒प्व॑म् । द॒द॒थुः॒ । विश्व॑काय ॥

Mantra without Swara
अवस्यते स्तुवते कृष्णियाय ऋजूयते नासत्या शचीभिः। पशुं न नष्टमिव दर्शनाय विष्णाप्वं ददथुर्विश्वकाय ॥

अवस्यते। स्तुवते। कृष्णियाय। ऋजुऽयते। नासत्या। शचीभिः। पशुम्। न। नष्टम्ऽइव। दर्शनाय। विष्णाप्वम्। ददथुः। विश्वकाय ॥ १.११६.२३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 12 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) असत्य के छोड़ने से सत्य के ग्रहण करने, पढ़ाने और उपदेश करनेवालो ! तुम दोनों (शचीभिः) अच्छी शिक्षा देनेवाली वाणियों से (अवस्यते) अपनी रक्षा और (स्तुवते) धर्म को चाहते हुए (ऋजूयते) सीधे स्वभाववाले के समान वर्त्तनेवाले (कृष्णियाय) आकर्षण के योग्य अर्थात् बुद्धि जिसको चाहती उस (विश्वकाय) संसार पर दया करनेवाले (दर्शनाय) धर्म-अधर्म को देखते हुए मनुष्य के लिये (पशुम्, न) जैसे पशु को प्रत्यक्ष दिखावे वैसे और जैसे (नष्टमिव) खुए हुए वस्तु को ढूँढ के बतावें, वैसे (विष्णाप्वम्) विद्या में रमे हुए विद्वानों को जो बोध प्राप्त होता है। उसको (ददथुः) देओ ॥ २३ ॥
Essence
इस मन्त्र में दो उपमालङ्कार हैं। शास्त्र के वक्ता, उपदेश करने और विद्या पढ़ानेवाले विद्वान् जन जैसे प्रत्यक्ष गौ आदि पशु को वा छिपे हुए वस्तु को दिखाकर प्रत्यक्ष कराते हैं, वैसे शम, दम आदि गुणों से युक्त बुद्धिमान् श्रोता वा अध्येताओं को पृथिवी से लेके ईश्वरपर्य्यन्त पदार्थों का विज्ञान देनेवाली साङ्गोपाङ्ग विद्याओं को प्रत्यक्ष करावें और इस विषय में कपट और आलस्य आदि निन्दित कर्म कभी न करें ॥ २३ ॥
Subject
अब पढ़ाने और उपदेश करनेवाले क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।