Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 21

191 Sukta
25 Mantra
1/116/21
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
एक॑स्या॒ वस्तो॑रावतं॒ रणा॑य॒ वश॑मश्विना स॒नये॑ स॒हस्रा॑। निर॑हतं दु॒च्छुना॒ इन्द्र॑वन्ता पृथु॒श्रव॑सो वृषणा॒वरा॑तीः ॥

एक॑स्याः । वस्तोः॑ । आ॒व॒त॒म् । रणा॑य । वश॑म् । अ॒श्वि॒ना॒ । स॒नये॑ । स॒हस्रा॑ । निः । अ॒ह॒त॒म् । दु॒च्छुनाः॑ । इन्द्र॑ऽवन्ता । पृ॒थु॒ऽश्रव॑सः । वृ॒ष॒णौ॒ । अरा॑तीः ॥

Mantra without Swara
एकस्या वस्तोरावतं रणाय वशमश्विना सनये सहस्रा। निरहतं दुच्छुना इन्द्रवन्ता पृथुश्रवसो वृषणावरातीः ॥

एकस्याः। वस्तोः। आवतम्। रणाय। वशम्। अश्विना। सनये। सहस्रा। निः। अहतम्। दुच्छुनाः। इन्द्रऽवन्ता। पृथुऽश्रवसः। वृषणौ। अरातीः ॥ १.११६.२१

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 12 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषणौ) शस्त्र-अस्त्र की वर्षा करनेवाले (इन्द्रवन्ता) बहुत ऐश्वर्ययुक्त (अश्विना) सूर्य्य और चन्द्रमा के तुल्य सभा और सेना के अधीशो ! (दुच्छुनाः) जिससे सुख निकल गया उन शत्रु सेनाओं को जैसे अन्धकार और मेघों को सूर्य्य जीतता है, वैसे (एकस्याः) एक सेना के (रणाय) संग्राम के लिये जो पठाना है, उससे (वस्तोः) एक दिन के बीच (आवतम्) अपनी सेना के विजय को चाहो और उन सेनाओं को अपने (वशम्) वश में लाकर (सहस्रा) (सनये) हजारों धनादि पदार्थों को भोगने के लिये (पृथुश्रवसः) जिनके बहुत अन्न आदि पदार्थ हैं और (अरातीः) जो किसी को सुख नहीं देतीं, उन शत्रुसेनाओं को (निरहतम्) निरन्तर मारो ॥ २१ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और चन्द्रमा के उदय से अन्धकार की निवृत्ति होकर सब प्राणी सुखी होते हैं, वैसे धर्मरूपी व्यवहार से शत्रुओं और अधर्म की निवृत्ति होने से धर्मात्मा जन अच्छे राज्य में सुखी होते हैं ॥ २१ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।