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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 20

191 Sukta
25 Mantra
1/116/20
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
परि॑विष्टं जाहु॒षं वि॒श्वत॑: सीं सु॒गेभि॒र्नक्त॑मूहथू॒ रजो॑भिः। वि॒भि॒न्दुना॑ नासत्या॒ रथे॑न॒ वि पर्व॑ताँ अजर॒यू अ॑यातम् ॥

परि॑ऽविष्टम् । जा॒हु॒षम् । वि॒श्वतः॑ । सी॒म् । सु॒ऽगेभिः॑ । नक्त॑म् । ऊ॒ह॒थुः॒ । रजः॑ऽभिः । वि॒ऽभि॒न्दुना॑ । ना॒स॒त्या॒ । रथे॑न । वि । पर्व॑तान् । अ॒ज॒र॒यू इति॑ । अ॒या॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
परिविष्टं जाहुषं विश्वत: सीं सुगेभिर्नक्तमूहथू रजोभिः। विभिन्दुना नासत्या रथेन वि पर्वताँ अजरयू अयातम् ॥

परिऽविष्टम्। जाहुषम्। विश्वतः। सीम्। सुऽगेभिः। नक्तम्। ऊहथुः। रजःऽभिः। विऽभिन्दुना। नासत्या। रथेन। वि। पर्वतान्। अजरयू इति। अयातम् ॥ १.११६.२०

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 11 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) सत्य धर्म के पालनेहारे सभासेनाधीशो ! तुम दोनों जैसे (अजरयू) जीर्णता आदि दोषों से रहित सूर्य और चन्द्रमा (सुगेभिः) जिनमें कि सुख से गमन हो उन मार्ग और (रजोभिः) लोकों के साथ (नक्तम्) रात्रि और (पर्वतान्) मेघ वा पहाड़ों को यथायोग्य व्यवहारों में लाते हैं, वैसे (विभिन्दुना) विविध प्रकार से छिन्न-भिन्न करनेवाले (रथेन) रथ से सेना को यथायोग्य कार्य में (ऊहथुः) पहुँचाओ, (विश्वतः) सब ओर से (सीम्) मर्यादा को (परिविष्टम्) व्याप्त होओ, (जाहुषम्) प्राप्त होने योग्य नगरादि के राज्य को पाकर पर्वत के तुल्य शत्रुओं को (वि, आयातम्) विभेद कर प्राप्त होओ ॥ २० ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे राजा के सभासद् जन धर्म के अनुकूल मार्गों से राज्य पाकर किला में वा पर्वत आदि स्थानों में ठहरे हुए शत्रुओं को वश में करके अपने प्रभाव को प्रकाशित करते हैं, वैसे सूर्य और चन्द्रमा पृथिवी के पदार्थों को प्रकाशित करते हैं। जैसे इन सूर्य्य और चन्द्रमा के निकट न होने से अन्धकार उत्पन्न होता है, वैसे राजपुरुषों के अभाव में अन्यायरूपी अन्धकार प्रवृत्त हो जाता है ॥ २० ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।