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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 2

191 Sukta
25 Mantra
1/116/2
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वी॒ळु॒पत्म॑भिराशु॒हेम॑भिर्वा दे॒वानां॑ वा जू॒तिभि॒: शाश॑दाना। तद्रास॑भो नासत्या स॒हस्र॑मा॒जा य॒मस्य॑ प्र॒धने॑ जिगाय ॥

वी॒ळु॒पत्म॑ऽभिः । आ॒शु॒हेम॑ऽभिः । वा॒ । दे॒वाना॑म् । वा॒ । जू॒तिऽभिः॑ । शाश॑दाना । तत् । रास॑भः । ना॒स॒त्या॒ । स॒हस्र॑म् । आ॒जा । य॒मस्य॑ । प्र॒ऽधने॑ । जि॒गा॒य॒ ॥

Mantra without Swara
वीळुपत्मभिराशुहेमभिर्वा देवानां वा जूतिभि: शाशदाना। तद्रासभो नासत्या सहस्रमाजा यमस्य प्रधने जिगाय ॥

वीळुपत्मऽभिः। आशुहेमऽभिः। वा। देवानाम्। वा। जूतिऽभिः। शाशदाना। तत्। रासभः। नासत्या। सहस्रम्। आजा। यमस्य। प्रऽधने। जिगाय ॥ १.११६.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 8 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शाशदाना) पदार्थों को यथायोग्य छिन्न-छिन्न करनेहारे (नासत्या) सत्यस्वभावी सभापति और सेनापति ! आप जैसे (वीडुपत्मभिः) बल से गिरते और (आशुहेमभिः) शीघ्र पहुँचाते हुए पदार्थों से (वा) अथवा (देवानाम्) विद्वानों की (जूतिभिः) जिनसे अपना चाहा हुआ काम मिले सिद्ध हो उन युद्ध की क्रियाओं से (वा) निश्चय कर अपने कामों को निरन्तर तर्क-वितर्क से सिद्ध करते हों वैसे (तत्) उस आचरण को करता हुआ (रासभः) कहे हुए उपयोग को जो प्राप्त उस पृथिवी आदि पदार्थसमूह के समान पुरुष (प्रधने) उत्तम-उत्तम गुण जिसमें प्राप्त होते उस (आजा) संग्राम में (यमस्य) समीप आये हुए मृत्यु के समान शत्रुओं के (सहस्रम्) असंख्यात वीरों को (जिगाय) जीते ॥ २ ॥
Essence
जैसे अग्नि वा जल वन वा पृथिवी को प्रवेश कर उसको जलाता वा छिन्न-भिन्न करता है, वैसे अत्यन्त वेग करनेहारे बिजुली आदि पदार्थों से किये हुए शस्त्र और अस्त्रों से शत्रु जन जीतने चाहिये ॥ २ ॥
Subject
अब युद्ध के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।