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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 19

191 Sukta
25 Mantra
1/116/19
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
र॒यिं सु॑क्ष॒त्रं स्व॑प॒त्यमायु॑: सु॒वीर्यं॑ नासत्या॒ वह॑न्ता। आ ज॒ह्नावीं॒ सम॑न॒सोप॒ वाजै॒स्त्रिरह्नो॑ भा॒गं दध॑तीमयातम् ॥

र॒यिम् । सु॒ऽक्ष॒त्रम् । सु॒ऽअ॒प॒त्यम् । आयुः॑ । सु॒ऽवीर्य॑म् । ना॒स॒त्या॒ । वह॑न्ता । आ । ज॒ह्नावी॑म् । सऽम॑नसा । उप॑ । वाजैः॑ । त्रिः । अह्नः॑ । भा॒गम् । दध॑तीम् । अ॒या॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
रयिं सुक्षत्रं स्वपत्यमायु: सुवीर्यं नासत्या वहन्ता। आ जह्नावीं समनसोप वाजैस्त्रिरह्नो भागं दधतीमयातम् ॥

रयिम्। सुऽक्षत्रम्। सुऽअपत्यम्। आयुः। सुऽवीर्यम्। नासत्या। वहन्ता। आ। जह्नावीम्। सऽमनसा। उप। वाजैः। त्रिः। अह्नः। भागम्। दधतीम्। अयातम् ॥ १.११६.१९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 11 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (समनसा) समान विज्ञानवाले (वहन्ता) उत्तम सुख को प्राप्त हुए (नासत्या) सत्यधर्मपालक सभा सेना के अधिपतियो ! तुम दोनों सनातन न्याय के सेवन से (रयिम्) धनसमूह (सुक्षत्रम्) अच्छे राज्य (स्वपत्यम्) अच्छे संतान (आयुः) चिरकाल जीवन (सुवीर्य्यम्) उत्तम पराक्रम को और (वाजैः) ज्ञान वा वेगयुक्त भृत्यादिकों के साथ वर्त्तमान (जह्नावीम्) छोड़ने योग्य शत्रुओं की सेना की विरोधिनी इस सेना को तथा (अह्नः) दिन के (भागम्) सेवने योग्य विभाग अर्थात् समय को और (त्रिः) तीन बार (दधतीम्) धारण करती हुई सेना के (उप, आ, अयातम्) समीप अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ॥ १९ ॥
Essence
कोई विद्या और सत्यन्याय के सेवन के विना इन धन आदि पदार्थों को प्राप्त हो और इनकी रक्षा कर सुख नहीं कर सकता है, इससे धर्म के सेवन से ही राज्य आदि प्राप्त हो सकता है ॥ १९ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।