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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 18

191 Sukta
25 Mantra
1/116/18
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदया॑तं॒ दिवो॑दासाय व॒र्तिर्भ॒रद्वा॑जायाश्विना॒ हय॑न्ता। रे॒वदु॑वाह सच॒नो रथो॑ वां वृष॒भश्च॑ शिंशु॒मार॑श्च यु॒क्ता ॥

यत् । अया॑तम् । दिवः॑ऽदासाय । व॒र्तिः । भ॒रत्ऽवा॑जाय । अ॒श्वि॒ना॒ । हय॑न्ता । रे॒वत् । उ॒वा॒ह॒ । स॒च॒नः । रथः॑ । वा॒म् । वृ॒ष॒भः । च॒ । शिं॒शु॒मारः॑ । च॒ । यु॒क्ता ॥

Mantra without Swara
यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायाश्विना हयन्ता। रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारश्च युक्ता ॥

यत्। अयातम्। दिवःऽदासाय। वर्तिः। भरत्ऽवाजाय। अश्विना। हयन्ता। रेवत्। उवाह। सचनः। रथः। वाम्। वृषभः। च। शिंशुमारः। च। युक्ता ॥ १.११६.१८

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 11 Mantra » 3

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Meaning
हे (हयन्ता) चलने (युक्ता) योगाभ्यास करने और (अश्विना) शत्रुसेना में व्याप्त होनेवाले सभा सेना के पतियो ! तुम दोनों (दिवोदासाय) न्याय और विद्या प्रकाश के देनेवाले (भरद्वाजाय) जिसके कि पुष्ट होते हुए पुष्टिमान् वेगवाले योद्धा हैं उसके लिये (यत्) जिस (वर्त्तिः) वर्त्तमान (रेवत्) अत्यन्त धनयुक्त गृह आदि वस्तु को (अयाताम्) प्राप्त होओ (च) और जो (वाम्) तुम दोनों का (वृषभः) विजय की वर्षा करानेहारा (शिंशुमारः) जिससे धर्म को उल्लङ्घ के चलानेहारों का विनाश करता है जो कि (सचनः) समस्त अपने सेनाङ्गों से युक्त (रथः) मनोहर विमानादि रथ तुम लोगों को चाहे हुए स्थान में (उवाह) पहुँचाता है, उसकी (च) तथा उक्त गृह आदि की रक्षा करो ॥ १८ ॥
Essence
राजा आदि राजपुरुषों को समस्त अपनी सामग्री न्याय से राज्य की पालना करने ही के लिये बनानी चाहिये ॥ १८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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