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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 17

191 Sukta
25 Mantra
1/116/17
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ वां॒ रथं॑ दुहि॒ता सूर्य॑स्य॒ कार्ष्मे॑वातिष्ठ॒दर्व॑ता॒ जय॑न्ती। विश्वे॑ दे॒वा अन्व॑मन्यन्त हृ॒द्भिः समु॑ श्रि॒या ना॑सत्या सचेथे ॥

आ । वा॒म् । रथ॑म् । दु॒हि॒ता । सूर्य॑स्य । कार्ष्म॑ऽइव । अ॒ति॒ष्ठ॒त् । अर्व॑ता । जय॑न्ती । विश्वे॑ । दे॒वाः । अनु॑ । अ॒म॒न्य॒न्त॒ । हृ॒त्ऽभिः । सम् । ऊँ॒ इति॑ । श्रि॒या । ना॒स॒त्या॒ । स॒चे॒थे॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य कार्ष्मेवातिष्ठदर्वता जयन्ती। विश्वे देवा अन्वमन्यन्त हृद्भिः समु श्रिया नासत्या सचेथे ॥

आ। वाम्। रथम्। दुहिता। सूर्यस्य। कार्ष्मऽइव। अतिष्ठत्। अर्वता। जयन्ती। विश्वे। देवाः। अनु। अमन्यन्त। हृत्ऽभिः। सम्। ऊँ इति। श्रिया। नासत्या। सचेथे इति ॥ १.११६.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 11 Mantra » 2

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Meaning
हे (नासत्या) अच्छे विज्ञान का प्रकाश करनेवाले सभा सेनापति जनो ! (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (दुहिता) जो दूरदेश में हित करनेवाली कन्या जैसी कान्ति प्रातःसमय की वेला और (कार्ष्मेव) काठ आदि पदार्थों के समान (वाम्) तुम लोगों की (जयन्ती) शत्रुओं को जीतनेवाली सेना (अर्वता) घोड़े से जुड़े हुए (रथम्) रथ को (आ, अतिष्ठत्) स्थित हो अर्थात् रथ पर स्थित होवे वा जिसको (विश्वे) समस्त (देवाः) विद्वान् जन (हृद्भिः) अपने चित्तों से (अनु, अमन्यन्त) अनुमान करें उसको (उ) तौ (श्रिया) शुभ लक्षणोंवाली लक्ष्मी अर्थात् अच्छे धन से युक्त सेना को तुम लोग (सं, सचेथे) अच्छे प्रकार इकट्ठा करो ॥ १७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! समस्त विद्वानों ने प्रशंसा की हुई शस्त्र, अस्त्र, वाहन तथा और सामग्री आदि सहित धनवती सेना को सिद्ध कर जैसे सूर्य्य अपना प्रकाश करे, वैसे तुम लोग धर्म और न्याय का प्रकाश कराओ ॥ १७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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