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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 15

191 Sukta
25 Mantra
1/116/15
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒रित्रं॒ हि वेरि॒वाच्छे॑दि प॒र्णमा॒जा खे॒लस्य॒ परि॑तक्म्यायाम्। स॒द्यो जङ्घा॒माय॑सीं वि॒श्पला॑यै॒ धने॑ हि॒ते सर्त॑वे॒ प्रत्य॑धत्तम् ॥

च॒रित्र॑म् । हि । वेःऽइ॑व । अच्छे॑दि । प॒र्णम् । आ॒जा । खे॒लस्य॑ । परि॑ऽतक्म्यायाम् । स॒द्यः । जङ्घा॑म् । आय॑सीम् । वि॒श्पला॑यै । धने॑ । हि॒ते । सर्त॑वे । प्रति॑ । अ॒ध॒त्त॒म् ॥

Mantra without Swara
चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्। सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम् ॥

चरित्रम्। हि। वेःऽइव। अच्छेदि। पर्णम्। आजा। खेलस्य। परिऽतक्म्यायाम्। सद्यः। जङ्घाम्। आयसीम्। विश्पलायै। धने। हिते। सर्तवे। प्रति। अधत्तम् ॥ १.११६.१५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 5

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Meaning
हे सभा सेनाधिपति ! तुम दोनों से (आजा) संग्राम में (परितक्म्यायाम्) रात्रि में (खेलस्य) शत्रु के खण्ड का (चरित्रम्) स्वाभाविक चरित्र अर्थात् शत्रुजनों की अलग-अलग बनी हुई टोली-टोली की चालकियाँ (वेरिव) उड़ते हुए पक्षी का जैसे (पर्णम्) पंख काटा जाय वैसे (सद्यः) शीघ्र (अच्छेदि) छिन्न-भिन्न की जायं तथा तुम (हिते) सुख बढ़ानेवाले (धने) सुवर्ण आदि धन के निमित्त (विश्पलायै) प्रजाजनों को सुख पहुँचानेवाली नीति के लिये (आयसीम्) लोहे के विकार से बनी हुई (जङ्घाम्) जिससे कि मारते हैं उसकी खाल को (सर्त्तवे) शत्रुओं पर जाने अर्थात् चढ़ाई करने के लिये (हि) ही (प्रत्यधत्तम्) प्रत्यक्ष धारण करो ॥ १५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। प्रजाजनों की पालना करने में अत्यन्त चित्त दिये हुए भद्र राजा आदि जनों को चाहिये कि पखेरू के पंखों के समान दुष्टों के चरित्र को युद्ध में छिन्न-भिन्न करें। शस्त्र और अस्त्रों को धारण कर प्रजाजनों की पालना करें। क्योंकि जो प्रजाजनों से कर लिया जाता है, उसका बदला देना उन प्रजाजनों की रक्षा करना ही समझना चाहिये ॥ १५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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