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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 13

191 Sukta
25 Mantra
1/116/13
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अजो॑हवीन्नासत्या क॒रा वां॑ म॒हे याम॑न्पुरुभुजा॒ पुर॑न्धिः। श्रु॒तं तच्छासु॑रिव वध्रिम॒त्या हिर॑ण्यहस्तमश्विनावदत्तम् ॥

अजो॑हवीत् । ना॒स॒त्या॒ । क॒रा । वा॒म् । म॒हे । याम॑न् । पु॒रु॒ऽभु॒जा॒ । पुर॑म्ऽधिः । श्रु॒तम् । तत् । शासुः॑ऽइव । व॒ध्र॒िऽम॒त्याः । हिर॑ण्यऽहस्तम् । अ॒श्वि॒नौ॒ । अ॒द॒त्त॒म् ॥

Mantra without Swara
अजोहवीन्नासत्या करा वां महे यामन्पुरुभुजा पुरन्धिः। श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम् ॥

अजोहवीत्। नासत्या। करा। वाम्। महे। यामन्। पुरुऽभुजा। पुरम्ऽधिः। श्रुतम्। तत्। शासुःऽइव। वध्रिऽमत्या। हिरण्यऽहस्तम्। अश्विनौ। अदत्तम् ॥ १.११६.१३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नासत्या) असत्य अज्ञान के विनाश से सत्य का प्रकाश करने (पुरुभुजा) बहुत आनन्दों के भोगने तथा (अश्विनौ) शुभ गुण और विद्या में व्याप्त होनेवाले अध्यापको ! जो (पुरन्धिः) बहुत विद्यायुक्त विद्वान् (वध्रिमत्याः) प्रशंसित जिसकी वृद्धि है, उस उत्तम स्त्री के (करा) कर्म करते हुए दो पुत्रों का (महे) अत्यन्त (यामन्) सुख भोगने के लिये (अजोहवीत्) निरन्तर ग्रहण करे और (वाम्) तुम दोनों का जो (श्रुतम्) सुना-पढ़ा है (तत्) उसको (शासुरिव) जैसे पूर्ण विद्यायुक्त पढ़ानेवाले से शिष्य ग्रहण करे वैसे निरन्तर ग्रहण करे। वे तुम दोनों विद्या चाहनेवाले सब जनों के लिये जो ऐसा है कि (हिरण्यहस्तम्) जिससे हाथ में सुवर्ण आता है, उस पढ़े सीखे बोध को (अदत्तम्) निरन्तर देवो ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे विद्वानो जैसे विद्वान् जन विदुषी स्त्री का पाणिग्रहण कर गृहाश्रम के व्यवहार को सिद्ध करे, वैसे बुद्धिमान् विद्यार्थियों का संग्रह कर पूर्ण विद्याप्रचार को करो और जैसे पढ़ानेवाले से पढ़नेवाले विद्या का संग्रह कर आनन्दित होते हैं, वैसे विद्वान् स्त्री-पुरुष अपने तथा औरों के सन्तानों को उत्तम शिक्षा से विद्या देकर सदा प्रमुदित होवें ॥ १३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।