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Rigveda Mandal 1 / Sukta 116 / Mantra 11

191 Sukta
25 Mantra
1/116/11
Devata- अश्विनौ Rishi- कक्षीवान् Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तद्वां॑ नरा॒ शंस्यं॒ राध्यं॑ चाभिष्टि॒मन्ना॑सत्या॒ वरू॑थम्। यद्वि॒द्वांसा॑ नि॒धिमि॒वाप॑गूळ्ह॒मुद्द॑र्श॒तादू॒पथु॒र्वन्द॑नाय ॥

तत् । वा॒म् । न॒रा॒ । शंस्य॑म् । राध्य॑म् । च॒ । अ॒भि॒ष्टि॒ऽमत् । ना॒स॒त्या॒ । वरू॑थम् । यत् । वि॒द्वांसा॑ । नि॒धिम्ऽइ॑व । अप॑ऽगूळ्हम् । उत् । द॒र्श॒तात् । ऊ॒पथुः॑ । वन्द॑नाय ॥

Mantra without Swara
तद्वां नरा शंस्यं राध्यं चाभिष्टिमन्नासत्या वरूथम्। यद्विद्वांसा निधिमिवापगूळ्हमुद्दर्शतादूपथुर्वन्दनाय ॥

तत्। वाम्। नरा। शंस्यम्। राध्यम्। च। अभिष्टिऽमत्। नासत्या। वरूथम्। यत्। विद्वांसा। निधिम्ऽइव। अपऽगूळ्हम्। उत्। दर्शतात्। ऊपथुः। वन्दनाय ॥ १.११६.११

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 10 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरा) धर्म की प्राप्ति (नासत्या) और सदा सत्य की पालना करने और (विद्वांसा) समस्त विद्या जाननेवाले धर्मराज, सभापति विद्वानो ! (वाम्) तुम दोनों का (यत्) जो (शंस्यम्) प्रशंसनीय (च) और (राध्यम्) सिद्ध करने योग्य (अभिष्टिमत्) जिसमें चाहे हुए प्रशंसित सुख हैं (वरूथम्) जो स्वीकार करने योग्य (अपगूढम्) जिसमें गुप्तपन अलग हो गया ऐसा जो प्रथम कहा हुआ गृहाश्रमसंबन्धि कर्म है, (तत्) उसको (निधिमिव) धन के कोष के समान (दर्शतात्) दिखनौट रूप से (वन्दनाय) सब ओर से सत्कार करने योग्य संतान और प्रशंसा के लिये (उत्, ऊपथुः) उच्च श्रेणी को पहुँचाओ अर्थात् उन्नति देओ ॥ ११ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! विद्यानिधि के परे सुख देनेवाला धन कोई भी तुम मत जानो। न इस कर्म के विना चाहे हुए संतान और सुख मिल सकते हैं और न सत्यासत्य के विचार से निर्णीत ज्ञान के विना विद्या की वृद्धि होती है, यह जानो ॥ ११ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।