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Rigveda Mandal 1 / Sukta 115 / Mantra 5

191 Sukta
6 Mantra
1/115/5
Devata- सूर्यः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्याभि॒चक्षे॒ सूर्यो॑ रू॒पं कृ॑णुते॒ द्योरु॒पस्थे॑। अ॒न॒न्तम॒न्यद्रुश॑दस्य॒ पाज॑: कृ॒ष्णम॒न्यद्ध॒रित॒: सं भ॑रन्ति ॥

तत् । मि॒त्रस्य॑ । वरु॑णस्य । अ॒भि॒ऽचक्षे॑ । सूर्यः॑ । रू॒पम् । कृ॒णु॒ते॒ । द्योः । उ॒पऽस्थे॑ । अ॒न॒न्तम् । अ॒न्यत् । रुश॑त् । अ॒स्य॒ । पाजः॑ । कृ॒ष्णम् । अ॒न्यत् । ह॒रितः॑ । सम् । भ॒र॒न्ति॒ ॥

Mantra without Swara
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रूपं कृणुते द्योरुपस्थे। अनन्तमन्यद्रुशदस्य पाज: कृष्णमन्यद्धरित: सं भरन्ति ॥

तत्। मित्रस्य। वरुणस्य। अभिऽचक्षे। सूर्यः। रूपम्। कृणुते। द्योः। उपऽस्थे। अनन्तम्। अन्यत्। रुशत्। अस्य। पाजः। कृष्णम्। अन्यत्। हरितः। सम्। भरन्ति ॥ १.११५.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 5

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Meaning
हे मनुष्यो ! तुम लोग जिसके सामर्थ्य से (मित्रस्य) प्राण और (वरुणस्य) उदान का (अभिचक्षे) सम्मुख दर्शन होने के लिये (द्यौः) प्रकाश के (उपस्थे) समीप में ठहरा हुआ (सूर्य्यः) सूर्य्यलोक अनेक प्रकार (रूपम्) प्रत्यक्ष देखने योग्य रूप को (कृणुते) प्रकट करता है। (अस्य) इस सूर्य के (अन्यत्) सबसे अलग (रुशत्) लाल आग के समान जलते हुए (पाजः) बल तथा रात्रि के (अन्यत्) अलग (कृष्णम्) काले-काले अन्धकार रूप को (हरितः) दिशा-विदिशा (सं, भरन्ति) धारण करती हैं (तत्) उस (अनन्तम्) देश, काल और वस्तु के विभाग से शून्य परब्रह्म का सेवन करो ॥ ५ ॥
Essence
जिसके सामर्थ्य से रूप, दिन और रात्रि की प्राप्ति का निमित्त सूर्य श्वेत-कृष्ण रूप के विभाग से दिन-रात्रि को उत्पन्न करता है, उस अनन्त परमेश्वर को छोड़कर किसी और की उपासना मनुष्य नहीं करें, यह विद्वानों को निरन्तर उपदेश करना चाहिये ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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