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Rigveda Mandal 1 / Sukta 115 / Mantra 4

191 Sukta
6 Mantra
1/115/4
Devata- सूर्यः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तत्सूर्य॑स्य देव॒त्वं तन्म॑हि॒त्वं म॒ध्या कर्तो॒र्वित॑तं॒ सं ज॑भार। य॒देदयु॑क्त ह॒रित॑: स॒धस्था॒दाद्रात्री॒ वास॑स्तनुते सि॒मस्मै॑ ॥

तत् । सूर्य॑स्य । दे॒व॒ऽत्वम् । तत् । म॒हि॒ऽत्वम् । म॒ध्या । कर्तोः॑ । विऽत॑तम् । सम् । ज॒भा॒र॒ । य॒दा । इत् । अयु॑क्त । ह॒रितः॑ । स॒धऽस्था॑य् । आत् । रात्री॑ । वासः॑ । त॒नु॒ते॒ । सि॒मस्मै॑ ॥

Mantra without Swara
तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं सं जभार। यदेदयुक्त हरित: सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥

तत्। सूर्यस्य। देवऽत्वम्। तत्। महिऽत्वम्। मध्या। कर्तोः। विऽततम्। सम्। जभार। यदा। इत्। अयुक्त। हरितः। सधऽस्थात्। आत्। रात्री। वासः। तनुते। सिमस्मै ॥ १.११५.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यदा) जब (तत्) वह पहिले मन्त्र में कहा हुआ (सूर्य्यस्य) सूर्यमण्डल के (मध्या) बीच में (विततम्) व्याप्त ब्रह्म इस सूर्य्य के (देवत्वम्) प्रकाश (महित्वम्) बड़प्पन (कर्त्तोः) और काम का (संजभार) संहार करता अर्थात् प्रलय समय सूर्य्य के समस्त व्यवहार को हर लेता (आत्) और फिर जब सृष्टि को उत्पन्न करता है तब सूर्य्य को (अयुक्त) युक्त अर्थात् उत्पन्न करता और नियत कक्षा में स्थापन करता है। सूर्य्य (सधस्थात्) एक स्थान से (हरितः) दिशाओं को अपनी किरणों से व्याप्त होकर (सिमस्मै) समस्त लोक के लिये (वासः) अपने निवास का (तनुते) विस्तार करता तथा जिस ब्रह्म के तत्त्व से (रात्री) रात्री होती है (तत्, इत्) उसी ब्रह्म की उपासना तुम लोग करो तथा उसी को जगत् का कर्त्ता जानो ॥ ४ ॥
Essence
हे सज्जनो ! यद्यपि सूर्य्य आकर्षण से पृथिवी आदि पदार्थों का धारण करता है, पृथिवी आदि लोकों से बड़ा भी वर्त्तमान है। संसार का प्रकाश कर व्यवहार भी कराता है तो भी यह सूर्य्य परमेश्वर के उत्पादन, धारण और आकर्षण आदि गुणों के विना उत्पन्न होने, स्थिर रहने और पदार्थों का आकर्षण करने को समर्थ नहीं हो सकता। न इस ईश्वर के विना ऐसे-ऐसे लोक-लोकान्तरों की रचना, धारणा और इनके प्रलय करने को कोई समर्थ होता है ॥ ४ ॥
Subject
फिर उसी सूर्य का काम अगले मन्त्र में कहा है ।