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Rigveda Mandal 1 / Sukta 115 / Mantra 3

191 Sukta
6 Mantra
1/115/3
Devata- सूर्यः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
भ॒द्रा अश्वा॑ ह॒रित॒: सूर्य॑स्य चि॒त्रा एत॑ग्वा अनु॒माद्या॑सः। न॒म॒स्यन्तो॑ दि॒व आ पृ॒ष्ठम॑स्थु॒: परि॒ द्यावा॑पृथि॒वी य॑न्ति स॒द्यः ॥

भ॒द्राः । अश्वाः॑ । ह॒रितः॑ । सूर्य॑स्य । चि॒त्राः । एत॑ऽग्वाः । अ॒नु॒ऽमाद्या॑सः । न॒म॒स्यन्तः॑ । दि॒वः । आ । पृ॒ष्ठम् । अ॒स्थुः॒ । परि॑ । द्यावा॑पृथि॒वी । य॒न्ति॒ । स॒द्यः ॥

Mantra without Swara
भद्रा अश्वा हरित: सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः। नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थु: परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः ॥

भद्राः। अश्वाः। हरितः। सूर्यस्य। चित्राः। एतऽग्वाः। अनुऽमाद्यासः। नमस्यन्तः। दिवः। आ। पृष्ठम्। अस्थुः। परि। द्यावापृथिवी। यन्ति। सद्यः ॥ १.११५.३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 7 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(भद्राः) सुख के करानेहारे (अनुमाद्यासः) आनन्द करने के गुण से प्रशंसा के योग्य (नमस्यन्तः) सत्कार करते हुए विद्वान् जन जो (सूर्य्यस्य) सूर्य्यलोक की (चित्राः) चित्र विचित्र (एतग्वाः) इन प्रत्यक्ष पदार्थों को प्राप्त होती हुई (अश्वाः) बहुत व्याप्त होनेवाली किरणें (हरितः) दिशा और (द्यावापृथिवी) आकाश-भूमि को (सद्यः) शीघ्र (परि, यन्ति) सब ओर से प्राप्त होतीं (दिवः) तथा प्रकाशित करने योग्य पदार्थ के (पृष्ठम्) पिछले भाग पर (आ, अस्थुः) अच्छे प्रकार ठहरती हैं, उनको विद्या से उपकार में लाएँ ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि श्रेष्ठ पढ़ानेवाले शास्त्रवेत्ता विद्वानों को प्राप्त हो, उनका सत्कार कर, उनसे विद्या पढ़, गणित आदि क्रियाओं की चतुराई को ग्रहण कर, सूर्यसम्बन्धी व्यवहारों का अनुष्ठान कर कार्यसिद्धि करें ॥ ३ ॥
Subject
फिर सूर्य्य के काम का अगले मन्त्र में वर्णन किया है ।